Monday, 12 September 2016

मन की चाह


ख़ामोशी को बस ख़ामोशी रहने दो
दूर कर दो रौशनी को
आज जीने दो मुझे
बंद आँखों से,
जीना है अपने आपको
चढ़ा दो सांकल,
नहीं सुनना है किसी पुकार को
जो बाँध ले मुझे,
सुनाने दो बस अंतर की आवाज़ को,
मिटा दो,
इन परम्पराओं की लकीरों को ,
बहाने दो मन की धारा,
जहाँ तक बहे,
निर्बाध,
निर्द्वंद,
असीम,
अनंत,
बस बहने दो !

मत रोको ! मत रोको ! मत रोको !

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