Sunday, 4 September 2016

मानस प्रेम



मानस प्रेम
आओ
प्रिये ! बैठो !
बैठो मेरी स्मृतियों में
अपने साकार रूप में,
आज तुम्हें बताऊँ मैं, कि
तुम मेरे साथ न रह कर भी
कितना साथ रहते हो !

बताऊँ तुम्हें, कि
तुम्हारा सदेह होना
कितना क्षुद्र कर देता
मेरी चाहत को !
कि तृषित मन कितना तृप्त होता है
तुम्हारी अनुभूतियों की छुवन से !

ये क्या कम है – कि
युगों के अरमानों को
जी लेते हैं हम - क्षणों में !
विचरते निष्कंटक सुदूर
वादियों-पर्वतों के पार,
क्या देखी है – देह की ऐसी गति !?

आओ बताऊँ तुम्हें, कि
कितने झूठे पड़ जाते हैं शब्द
हम-दोनों के बीच
मन के संवेगों के सामने
समस्त कथ्य-अकथ्य का संवाहक
-- मानस तरगें हमारी !

आओ प्रिये !
तुम्हें बताऊँ आज ये भी, कि
हमारे एहसासों का मिलना
और एकाकार हो जाना
कितना स्वार्गिक हो जाता है,
कितनी अनूठी हो जाती है
अनुभूतियों की वह दिव्यता,
जब हम परिणत होते हैं
--एक गन्धर्व-जोड़े में !
और तब,

तब सब कुछ पारलौकिक-सा हो जाता है ! 

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