Saturday, 3 September 2016

पड़ोस बदल रहा है !



मैं परेशान हूँ, क्योंकि
मेरा पड़ोस बदल रहा !
धीरे-धीरे ! लगातार !
बदलाव के छींटें मेरे दहलीज तक आ रहे हैं !

पड़ोस की स्त्री तराश रही है स्वयं को
और उसकी किरचें चुभ रही हैं
-पुरुष के पैरों में !
छैनी-हथौड़ी की आवाजें असह्य हो रही हैं,
पुरुष चाहता है शान्ति
वैसी ही, जैसी पहले हुआ करती थी !

टूट रहा है तिलिस्मों का घेरा
पड़ोस की स्त्री अब नहीं करती इंतज़ार
गर्म तवे और आटे की लोई के साथ,
एकनिष्ठ समर्पिता बदल रही है खुद को,
अब नहीं तलाशती,
राख में बचे हुए जिंदा कोयले !
और हाँ, उसने आज़ाद कर दिया है,
सीकड़ में बंधे झबरे कुत्ते को भी !

ख्वाहिशों की चाय खदकने लगी है
उसके मन में भी,
आँचल का दूध उतर आया है बोतलों में,
आँखों के पानी पर, पुल है धुप के चश्मों का !
क्लबों में रंगीन बत्तियां जल रही हैं
और उसमें चमक रहे हैं लिपस्टिक के निशान
--वोद्का और वाइन के गिलासों पर !

मेरा पड़ोस बदल रहा है !

धीरे-धीरे ! लगातार !

No comments:

Post a Comment