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Monday, 12 September 2016

मन की चाह


ख़ामोशी को बस ख़ामोशी रहने दो
दूर कर दो रौशनी को
आज जीने दो मुझे
बंद आँखों से,
जीना है अपने आपको
चढ़ा दो सांकल,
नहीं सुनना है किसी पुकार को
जो बाँध ले मुझे,
सुनाने दो बस अंतर की आवाज़ को,
मिटा दो,
इन परम्पराओं की लकीरों को ,
बहाने दो मन की धारा,
जहाँ तक बहे,
निर्बाध,
निर्द्वंद,
असीम,
अनंत,
बस बहने दो !

मत रोको ! मत रोको ! मत रोको !

देवता


ओ मेरे देवता !
बड़ा नाज़ था कि
तुम मेरी ज़िन्दगी में आये |
नहीं, स्वतः नहीं आये;

पाया था तुम्हें मैंने,
वर्षों की तपस्या से |
मेरा सौभाग्य,
तुम प्रसन्न हुए !
मन तरंगित हुआ !
मेरा स्व तुममे तिरोहित होने लगा,
जाने कब प्रेम भक्ति बना
और संवेदनाएं;
पूजा के फूल बन
तेरे चरणों में अर्पित हो गए !
और तुम,
मेरे एहसासों में,
देवता हो गए !
फिर, धीरे से,
तुम्हारा देवत्व जाग गया,
लीलने लगा मेरे अस्तित्व को,
मेरे होने के एहसास को !
सूरज से कहा था,
तेरे माथे का तेज़ बने,
वो तेज़,
ताप बन झुलसाने लगा है मुझे !
चाँद को कहा था,
तेरे राहों को रोशन करे,
पर उस रौशनी की प्रखरता से;
अँधेरा छा रहा है;
मेरी आँखों में !
इसलिए,
अर्पित हैं,
ये पूजा के आखिरी फूल |
अब अलविदा !!
क्योंकि,
मनुष्य को मनुष्य ही चाहिए;
प्रेम करने के लिए,

कोई देवता नहीं !!   

Sunday, 4 September 2016

मानस प्रेम



मानस प्रेम
आओ
प्रिये ! बैठो !
बैठो मेरी स्मृतियों में
अपने साकार रूप में,
आज तुम्हें बताऊँ मैं, कि
तुम मेरे साथ न रह कर भी
कितना साथ रहते हो !

बताऊँ तुम्हें, कि
तुम्हारा सदेह होना
कितना क्षुद्र कर देता
मेरी चाहत को !
कि तृषित मन कितना तृप्त होता है
तुम्हारी अनुभूतियों की छुवन से !

ये क्या कम है – कि
युगों के अरमानों को
जी लेते हैं हम - क्षणों में !
विचरते निष्कंटक सुदूर
वादियों-पर्वतों के पार,
क्या देखी है – देह की ऐसी गति !?

आओ बताऊँ तुम्हें, कि
कितने झूठे पड़ जाते हैं शब्द
हम-दोनों के बीच
मन के संवेगों के सामने
समस्त कथ्य-अकथ्य का संवाहक
-- मानस तरगें हमारी !

आओ प्रिये !
तुम्हें बताऊँ आज ये भी, कि
हमारे एहसासों का मिलना
और एकाकार हो जाना
कितना स्वार्गिक हो जाता है,
कितनी अनूठी हो जाती है
अनुभूतियों की वह दिव्यता,
जब हम परिणत होते हैं
--एक गन्धर्व-जोड़े में !
और तब,

तब सब कुछ पारलौकिक-सा हो जाता है !