Showing posts with label kavita. Show all posts
Showing posts with label kavita. Show all posts

Friday, 26 October 2018

माँ


माँ
ओ प्यारी माँ !
बड़ी भोली है तू ,
सदियों से सौंपती आई है खुद को विरासत के रूप में ,
अपनी अगली पीढ़ी को ,
आज हम दफ़न करते हैं तेरी विरासत,
....ससम्मान !
क्षमा करना माँ,
तेरी सीख, तेरी मिशाल, नहीं दे सकते हम
अपनी अगली पीढ़ी को !
नहीं गुनगुना सकते ख़ामोशी के गीत
नीची नजरों के घाव गहरे हो गए हैं
नहीं सह सकते अब,
लिजलिजी विचारों और बजबजाती नज़रों के भिनभिनाहट को
इनको ताड़ना भी हमारी ही ताड़ना है....
हम बगावत करते हैं आज
तेरी संस्कारों से, तेरे जैसे अस्तित्व से
तेरे क़त्ल का सामान तेरे गहने बन गए
तू तेरी ही विशालता में विलीन कर दी गयी
शून्य में समा गयी शून्य छोड़ कर....!

अनुशरण की गति भी कोई गति है माँ,
एक पिंजरा है ये
और पिंजरे की गति कैसी..?
तेरी अग्नि परीक्षा भी तेरे काम न आई
तेरे सम्पूर्ण त्याग और समर्पण का प्रत्युत्तर था--एक वार !
जो तेरी पीठ पर हुआ – धोखे और निर्वासन का !
फिर भी तूने दिया ही,
और समा गयी धरती में – निःशब्द !
छोड़ कर एक चिर-प्रश्न !

छद्म-भोर और छद्म-भेष का भ्रम दोनों का
छले गए दोनों ही, साक्षी पूरी सृष्टि
फिर शिला बन सजा तूने क्यों पाई ?
दंड का अधिकारी था वो,
जिसे तेरी रक्षा का अहंकार था, या फिर वो ,
जिसने अपराध किया था....
ज्ञात है, तू अब भी निःशब्द है !
वर्जनाओं ने लील लिया है तेरे शब्दों को, तेरी आवाज़ को !
वर्जनाओं की दीवार विरासत है तेरी
कोई कमी ना रखी तूने भी उसे और ऊँचा करने में,
पर माँ, वर्जनाओं का आदर्श और उनका अनुपालन तो समान होना चाहिए न..?

इसलिए माँ, आज त्यागते हैं ये पिंजरा भी,
अब अपनी गति होगी हमारी
अपना लय होगा,
सहर्ष आमंत्रित हैं वो जो सहयात्री बनना चाहें..
हम स्वयं लेंगे अपनी धरती की गहराई और
अपने आकाश के असीमता की थाह !
और सीचेंगे इन्हीं से अपनी जड़ों को भी,
इंसान इंसान के बीच का भेद ना होगा तब,
देह की दुनिया से परे जीना सीखाएँगे हम—अपनी अगली पीढ़ी को !

Sunday, 18 June 2017

एक कविता - पिता के नाम !



पापा मतलब सादगी
पापा मतलब हिम्मत
पापा मतलब धैर्य
पापा मतलब संयम
पापा मतलब मुस्कराहट
पापा मतलब भय
पापा मतलब त्याग
पापा मतलब स्थितप्रज्ञ !!

इन पंक्तियों में मेरे पिता का पूरा व्यक्तित्व छिपा है. संभवतः उन्हें समझने के लिए एक बार पुनः मेरी उन स्मृतियों में झांकना होगा, जो हमेशा ही कठिन से कठिन परिस्थियों में मेरा वैचारिक और भावनात्मक संबल बना रहा.

मेरे लिए पापा का मतलब वो पुत्र,
जिसके सामने मानसिक असंतुलन के शिकार पिता का पुत्र हो जाना.
ऑफिस से लौटकर, जूता और खाने का डिब्बा यथास्थान रख;
सबसे पहले पिता का हाल पूछना. फिर,
पुत्र हुए पिता का,
मासूमियत से दिनभर की शिकायतों और इच्छाओं का पुलिंदा खोलना.
पापा का शांतचित हो सुनना, उचित आश्वासन दे संतुष्ट करना.
कभी-कभी असंतुलन की अवस्था में स्व-मल द्वारा गन्दा किये दीवार को अपने हाथों साफ़ करना.
यह जानते हुए कि कुछ हासिल नहीं,
उन्हें कभी पुचकार कर तो कभी झूठा गुस्सा दिखा समझाना.

पापा का मतलब वो पिता,
जिसके लिए एक तरफ दरवाज़े पर बेटी की बारात और दूसरी तरफ
जीवन-मृत्यु के बीच झूलता दुर्घटनाग्रस्त छोटा ‘सौतेला’ भाई.
घर में बेटी की शादी-कन्यादान और अस्पताल में
न्यूरोसर्जन द्वारा किया जा रहा १४ घंटे लम्बा ऑपरेशन.
इधर शादी संपन्न उधर ऑपरेशन.
कुछ घरातियों को छोड़ सारे बाराती और मेहमानों की अनभिज्ञता.
कुछ न कुछ तो थोड़ा-थोड़ा...... ‘लड़केवालों का हठ तो शगुन’
पिता का शांतचित सब संभालना...
बेटी किंकर्तव्यविमूढ़... पिता स्थितप्रज्ञ !!

ऐसी कई और अनमोल स्मृतियाँ हैं पापा की जिसने एक पिता को, पिता की ऊंचाई से कहीं ऊँचा रखा है.

लव यू पापा.

Friday, 2 December 2016

वो निशान जो लाल-नीले नहीं होते




          

१.
वो निशान जो लाल-नीले नहीं होते
ना फूटते हैं ना बहते हैं
पर रिसते-टीसते रहते हैं,
हर पल हर क्षण,
होते हैं, अपने पूरे वजूद के साथ
यमराज के साए से संतप्त
मन के सीलन भरे कोने में
मकड़ी के जालों से जूझते
कतरा भर रोशनी को तरसते
ना कोई दवा ना कोई दुआ
कोई स्थूल मसीहा नहीं,
असहाय स्वयं से
नहीं समझ पाते, कि
मसीहा पैदा नहीं होते
पैदा किये जाते हैं
स्वयं ही जगाना पड़ता है
--अपने अंतर के सोये मसीहे को !!

२.
वो लाल-उजले गुण
जिस पर दुनिया-जहान वारे जाते
ताड़ना की टोकरी  बन जाती है
अधिकार पाते ही,
जैसे हस्तगत करना ही लक्ष्य हो !!
जाने कैसे कालपुरूष की बौद्धिक प्रखरता
घुटनों में आ जाती है,
और होठों की खिलखिलाती हंसी
व्यंग्य की तिरछी मुस्कान बन जाती है
हर ढलती शाम जाने कहाँ से पा जाती है
--एक नए रंग और नाम का ठेंगा !
साहस फिर भी कम न होता
क्षण-क्षण दम तोड़ती प्रतिभा की
और जोहती बाट—अगले जनम की !!

३.
हर शाम वो आता
अपने जूते फटकारता,
काले साए सा दाखिल होता दरवाजे से
दंभ के निशान छोड़ता आगे बढ़ता
धंस जाता घर की आत्मा में !

अपने होने के गुमान में फुफकारता
पूरे होशो-हवास में, बेसुध
डंसता ऐसा, कि
महकता खिलता बागीचा बदल जाता
--कब्रिस्तान में !

और कब्र में दफ़न सारे मुर्दे
सुबह के इंतज़ार में कुलबुलाते रहते
--अपने-अपने ताबूतों में !! 

४.
सपनों में सिलवटें पड़ने लगी हैं
भोर का उजास लुभाता भी नहीं
अंतर की उदासी भी बंटती नहीं
दिवानगी ठिठकी खड़ी है
और कुण्डी चढ़ा दी है सयानेपन ने !
बालमन दौड़ना चाहे
बहुरूपियों और जंगमों के पीछे,
हो-हो कर झूठ-मूठ डरना चाहे
उसके लाल-काले-नीले चेहरे से,
पर बचपन की आवारगी और अल्हड़ता
का चेहरा ज़र्द हो गया है !
अब नहीं बहते--
चपल-चंचल हंसी के झोंके !
लुप्त होने लगी है—
आँखों से कौतूहल और मासूमियत !
क्योंकि हर चेहरे की आँखें 
भेड़िये सी दिखने लगी हैं,
और दिखने लगे हैं
--हाथों के लम्बे नाखून और उनसे टपकता लहू !!

5.
वो जीते-जागते हँसते-बोलते
परछाइयों में तब्दील हो जाते हैं,
चलती-फिरतीं परछाइयाँ !
हाँ, परछाइयाँ !

क्योंकि परछाइयाँ होतीं हैं,
शब्दहीन और शक्ल विहीन !
जहाँ संवादों के नाम पर होते हैं
सिर्फ, कुछ शारीरिक हरकतें !

जहाँ वेदना-संवेदना होती तो हैं
पर जर्जर शिरायें उस सन्देश को,
चेतना तक पहुंचा ही नहीं पातीं !

खामोशी का डेसिबल
ऋणात्मकता के उस हिस्से को छू लेता है
जहाँ अपने दिलों की धड़कनें ही
झंझावात पैदा करने लगतीं हैं !
जहाँ स्वयं के विचार सजीव हो उठते हैं
और फिर, असह्य हो जाती है - तिलमिलाहट !

परछाइयाँ भागतीं हैं- फिर से उसी शोर की ओर
और चलती रहतीं हैं, हम कदम बन
हाथों में हाथ डाले !
अपने विचारों के एक सौ अस्सी डिग्री पर !
साथ-साथ ! आजीवन !

---- सुमन उपाध्याय