Saturday, 10 September 2016

क्या अब हम हम नहीं रहे ?



क्या अब हम हम न रहे,
मैं और तुम हो गए हैं ?
या, कि जीवन की आपाधापी है
जो ज़रुरत भर की संतुष्टि से आगे
हर शौक पूरी कर लेने की ज़िद्द है ?

आज भी शाम वैसी ही होती है
वहीँ है किचन और वहीँ रोटियां पकाती मैं
और तो और वो आईना भी अभी तक वहीँ टंगा है
पर एक तुम ही गुम हो सारे परिदृश्य से
बार-बार देखती हूँ कि अब,
कहीं अब तो नहीं झांक रहे तुम
उस आईने से मुझे, तिरछे होकर
मुंह धोने के बहाने
पर नहीं दिखते यार !

क्या अब हम हम नहीं रहे,
मैं और तुम हो गए हैं ?

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