आकाशी बातें...... बस अपने मन की !
Saturday, 10 September 2016
मदारी का बन्दर
कुंद हो रही है धार बहते-बहते
वक़्त और बहाव का मिजाज़ भांपते
कितना मुश्किल होता है
किसी और के इशारे पर
चलना और ठिठकना !
हाँ
,
जैसे मदारी का बन्दर !
उस दिन क्या होगा
जब बन्दर के अन्दर का जंगल जाग उठेगा
??
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