गौरैया
१.
कभी-कभी मन की इच्छाएं
उन गौरैयों सी हो जाती है
जो अक्सर तपती-लहकती दोपहरी में
प्यास से खुली चोंच लिए महज
दो बूँद जल की तलाश में भटकती,
घड़ी-भर के शीतल छाँव की आस लिए
घुस आतीं हैं रोशनदानों से अन्दर,
अन्दर उन कमरों में, जहाँ होता है
तीव्र गति से घूमता एक बेजान पंखा
इंसानों के तन को शीतल करता,
जहाँ चलता रहता है,
अहंकार-आराम-अंगड़ाई में डूबा,
कहकहों और ठहाकों का दौर,
नादान नन्हीं-जान समझ ही नहीं पातीं, कि
ये अनाधिकार चेष्टा है उनकी, और
पंख फैलाये पूरे वेग से प्रवेश करतीं हैं अन्दर
और टकरा जातीं हैं उन बेजान डैनों से,
बस एक खटाक की आवाज़
और धप्प से स्पन्दनहीन गौरैया धरती पर !!
निश्चेष्ट ! संज्ञाशून्य !
तमाम तपिश और शीतलता की अनुभूतियों से पार !
उफ़ ! ये कैसा अवसान है मन की इच्छाओं का !!
ओह ! लेकिन ये क्या !!
फिर भी गौरैये के मन से
उन खुले रोशनदानों का मोह
और अन्दर की शीतलता की ललक
नहीं जा रही और
गौरैया एक बार फिर से – उसी रोशनदान में.....!!
२.
तू फिर आ गई गौरैया !
तू किसे ढूँढने आती है यहाँ, बार-बार
किसकी तलाश मजबूर करती है तूझे
यहाँ आने को ?
अरी भोली ! कितना समझाया तूझे
वो तेरा ही प्रतिबिम्ब है आईने में
और प्रतिबिम्ब भी भला बोला करते हैं !
पर तू है कि बार-बार चोंच मार कर
जाने क्या कहना चाहती है, या फिर
निकाल उसे आईने से बाहर
बांटना चाहती है सुख-दुःख
कि सखी की तलाश है तूझे |
अरी ओ गौरैया !
छोड़ नीड़ से आईने तक सफ़र
छोड़ अपना ही अक्स निहारना आईने में
थाह ले बाहर निकल आसमान की ऊँचाइयों की
पहचान अपनी ऊर्जा, कब तक
आखिर कब तक....
भोलेपन और मासूमियत की सांचे में ढलेगी
बचा अपना अस्तित्व और छोड़ दे वो आँगन
जो नहीं समझ पाते तेरी शुभता को
युग बदला संवत्सर बदला
पर तू निगोड़ी, रही भोली की भोली |

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