मन में
उग आया है एक पेड़
– शब्दों का !
जाने किसी ने रोपा है या
अरोपित ही
हुआ रातों-रात छतनार !
हवा का एक झोंका छू कर
क्या गया,
झरने लगे हैं अनगिनत शब्द
!
हथेलियों पर आ गिरे हैं -
बसंत के कुछ शब्द !
कुछ सुर्ख, शोखी में डूबे
कुछ हरी मखमली घास सी
फैली
गिलहरियों सी कुछ चंचल
शब्द
कुछ ओस की बूंदों सी शांत
और शीतल !
कुछ अतीत के शब्द
लिपट गए हैं गिर कर जड़ों
से,
तरेर रहे हैं आँखें
फुनगियों की ओर
बेपरवाही देख कर नई
कोंपलों की !
कुछ शब्द हैं, जैसे मासूम
शिशु
गुड-मुड हो कर आँचल की
छाँव तलाशते,
संदेह से परे, भरोसा हर
गोद का !
मधुर स्पर्श के मानिंद
हैं कुछ
जो छुते हैं दिल को
...और रोमांचित हो उठता
है रोम-रोम !
कुछ शब्दों में है, गहराई
झील सी
जो डूबा ले यूँ कि
बाद डूबने के भी सब रहें
बेखबर
..और हो जाएँ स्वयं से
परे !
मरीचिका जैसे हैं कुछ
शब्द
हर बढ़ते कदम के साथ बढ़ती
जाये दूरी भी
फिर-फिर वापस लौट आये
हाथ,
पर खत्म न हो उसे पाने का
मोह !
कुछ शब्द हैं, जो भरमाये
रखें उम्रभर
देते रहें दिलासा
नहीं छोड़ते उम्मीद का
दामन,
आकाश में टिमटिमाते तारों
जैसे
नहीं देते रोशनी पर,
बनाये रखते हैं रोशनी की
उम्मीद !

sundar
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