1.
कहो प्रिय
कुछ अपने मन की कहो
...कहो कुछ
दुनिया की भी,
या फिर कह
दो वो सपना ही
..जो आतुर
हो सच होने को,
नहीं तो वो
बोझ ही कह दो
...जो ढो
रहे हो यूँ ही
बेमतलब,
या फिर वो
प्रथम स्पर्श ही कह दो
...जो जी
रहे हो हर पलछिन में,
या कह दो
वो छुईमुई सी रातें ही
...जो राजी
ही न हों आगोश से निकलने को,
या कह दो
अलसाई सी वो सुबह ही
...जो
जगाती जुल्फों की बूंदों में भी ख़ुमारी ढूंढे
कुछ नहीं
तो कह दो जीवन का सफ़र ही
...जो अनथक
आज भी पहला कदम सा लगे !
कहो प्रिय
कुछ तो कहो – कुछ अपने मन की कुछ दुनिया की..!!
2.
कहते हो,
क्या रह गया है बाकि, अब कहने को !
पर, प्रिय, क्या कभी
कहा,
वर्षों के
इंतज़ार में भोगा वो अंतहीन दर्द !
कभी कहा उन
पलों का सफ़र,
जो बीता
युगों सा इंतज़ार में !
कभी कहा उन
खटकों को,
जो बेवजह
दौड़ा दिया करती थीं चौखट तक !
कभी कहा उन
तकरारों को
जो हुआ
करती थीं दिन-रात दिल और दिमाग के बीच !
कभी कहा उन
जागती रातों की कहानी,
जिनमें
ढूँढा करती थीं आँखें, नींद के बहाने !
कभी कहा उन
नज़रों के आतंक को,
जो ललचाती
बे-दरो-दीवार समझ कर !
कभी कहा उन
उम्मीदों की वो आँखें,
जो तलाशती
हर चेहरे में कुछ शब्द
..और उनमें
यादों की पोटली !
कभी कहा उस
आग को
जो धधकता
सीने में और फ़ैल जाता पोर-पोर में !
...प्रिय,
अंतहीन हैं कहानियां
और सबब एक
तुम और तुम्हारा इंतज़ार !

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