Wednesday, 7 September 2016

शब्दों का पेड़


मन में
उग आया है एक पेड़
– शब्दों का !
जाने किसी ने रोपा है या अरोपित ही
हुआ रातों-रात छतनार !
हवा का एक झोंका छू कर क्या गया,
झरने लगे हैं अनगिनत शब्द !

हथेलियों पर आ गिरे हैं - बसंत के कुछ शब्द !
कुछ सुर्ख, शोखी में डूबे
कुछ हरी मखमली घास सी फैली
गिलहरियों सी कुछ चंचल शब्द
कुछ ओस की बूंदों सी शांत और शीतल !

कुछ अतीत के शब्द
लिपट गए हैं गिर कर जड़ों से,
तरेर रहे हैं आँखें फुनगियों की ओर
बेपरवाही देख कर नई कोंपलों की  !

कुछ शब्द हैं, जैसे मासूम शिशु
गुड-मुड हो कर आँचल की छाँव तलाशते,
संदेह से परे, भरोसा हर गोद का !

मधुर स्पर्श के मानिंद हैं कुछ
जो छुते हैं दिल को
...और रोमांचित हो उठता है रोम-रोम !

कुछ शब्दों में है, गहराई झील सी
जो डूबा ले यूँ कि
बाद डूबने के भी सब रहें बेखबर
..और हो जाएँ स्वयं से परे !

मरीचिका जैसे हैं कुछ शब्द
हर बढ़ते कदम के साथ बढ़ती जाये दूरी भी
फिर-फिर वापस लौट आये हाथ,
पर खत्म न हो उसे पाने का मोह !

कुछ शब्द हैं, जो भरमाये रखें उम्रभर
देते रहें दिलासा
नहीं छोड़ते उम्मीद का दामन,
आकाश में टिमटिमाते तारों जैसे
नहीं देते रोशनी पर,

बनाये रखते हैं रोशनी की उम्मीद !

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