Monday, 5 September 2016

गीत

बरसे बरखा के रिमझिम फुहार सखी
नाचे बन के मयूरा छमा-छम सखी |
बाग लहसे बगीइचा लहसे, लहसे
अंगना में मेहदी के पतिया सखी |
नाचे बन के मयूर छमा-छम सखी |  

अमुआ बौराइल कुहुके कोयलिया
झुलुआ झुलावे ना आइले सजनवा
अरे पपीहा के बोलिया साले सखी
नाचे बन के मयूर छमा-छम सखी |  

अम्मा से बाबा टोह लगावें, पूछे
ननदी बैरनिया की सास बैरनिया
कइसे कहीं काहे हहरे करेजवा
भईले नोकरी बलम के बैरनिया सखी
नाचे बन के मयूर छमा-छम सखी |  

झींगुरा के झन-झन से बेंगवा के टर-टर
बीच रतिया में बिहँसे छतवो-दीवारवा
गईली सखिया-सलेहर गवनवा सखी
अरे जियरा में गड़ी जाला सूल सखी |

नाचे बन के मयूर छमा-छम सखी

गीत में प्रेम - प्रेम में गीत

पास में बैठो मोहब्बत
प्यार की बातें करें
दिन उजालों की नजर हो
रात हम मिल कर जीयें !
तुम तिनका तिनका नीड़ बनाओ
और मैं उसको सजाऊं
ख्वाबों की मैं देह बनूँ तो
तुम उसकी धड़कन बन जाओ !
पास में बैठो मोहब्बत
प्यार की बातें करें !

चल पड़ें हम जिस डगर पर
फूल और खुशबू संग चलें
मायूसियों की नजर लगे ना
गीत ऐसी गुनगुनाएं !
पास में बैठो मोहब्बत

प्यार की बातें करें !

Sunday, 4 September 2016

गौरैया

गौरैया
१.
कभी-कभी मन की इच्छाएं
उन गौरैयों सी हो जाती है
जो अक्सर तपती-लहकती दोपहरी में
प्यास से खुली चोंच लिए महज
दो बूँद जल की तलाश में भटकती,
घड़ी-भर के शीतल छाँव की आस लिए
घुस आतीं हैं रोशनदानों से अन्दर,
अन्दर उन कमरों में, जहाँ होता है
तीव्र गति से घूमता एक बेजान पंखा
इंसानों के तन को शीतल करता,
जहाँ चलता रहता है,
अहंकार-आराम-अंगड़ाई में डूबा,
कहकहों और ठहाकों का दौर,
नादान नन्हीं-जान समझ ही नहीं पातीं, कि
ये अनाधिकार चेष्टा है उनकी, और
पंख फैलाये पूरे वेग से प्रवेश करतीं हैं अन्दर
और टकरा जातीं हैं उन बेजान डैनों से,
बस एक खटाक की आवाज़
और धप्प से स्पन्दनहीन गौरैया धरती पर !!
निश्चेष्ट ! संज्ञाशून्य !
तमाम तपिश और शीतलता की अनुभूतियों से पार !
उफ़ ! ये कैसा अवसान है मन की इच्छाओं का !!

ओह ! लेकिन ये क्या !!
फिर भी गौरैये के मन से
उन खुले रोशनदानों का मोह
और अन्दर की शीतलता की ललक
नहीं जा रही और
गौरैया एक बार फिर से – उसी रोशनदान में.....!!
      
       २.
तू फिर आ गई गौरैया !
तू किसे ढूँढने आती है यहाँ, बार-बार
किसकी तलाश मजबूर करती है तूझे
यहाँ आने को ?

अरी भोली ! कितना समझाया तूझे
वो तेरा ही प्रतिबिम्ब है आईने में
और प्रतिबिम्ब भी भला बोला करते हैं !
पर तू है कि बार-बार चोंच मार कर
जाने क्या कहना चाहती है, या फिर
निकाल उसे आईने से बाहर
बांटना चाहती है सुख-दुःख
कि सखी की तलाश है तूझे |

अरी ओ गौरैया !
छोड़ नीड़ से आईने तक सफ़र
छोड़ अपना ही अक्स निहारना आईने में
थाह ले बाहर निकल आसमान की ऊँचाइयों की
पहचान अपनी ऊर्जा, कब तक
आखिर कब तक....
भोलेपन और मासूमियत की सांचे में ढलेगी
बचा अपना अस्तित्व और छोड़ दे वो आँगन
जो नहीं समझ पाते तेरी शुभता को
युग बदला संवत्सर बदला
पर तू निगोड़ी, रही भोली की भोली |

कब बदलेगी तू ? 

मानस प्रेम



मानस प्रेम
आओ
प्रिये ! बैठो !
बैठो मेरी स्मृतियों में
अपने साकार रूप में,
आज तुम्हें बताऊँ मैं, कि
तुम मेरे साथ न रह कर भी
कितना साथ रहते हो !

बताऊँ तुम्हें, कि
तुम्हारा सदेह होना
कितना क्षुद्र कर देता
मेरी चाहत को !
कि तृषित मन कितना तृप्त होता है
तुम्हारी अनुभूतियों की छुवन से !

ये क्या कम है – कि
युगों के अरमानों को
जी लेते हैं हम - क्षणों में !
विचरते निष्कंटक सुदूर
वादियों-पर्वतों के पार,
क्या देखी है – देह की ऐसी गति !?

आओ बताऊँ तुम्हें, कि
कितने झूठे पड़ जाते हैं शब्द
हम-दोनों के बीच
मन के संवेगों के सामने
समस्त कथ्य-अकथ्य का संवाहक
-- मानस तरगें हमारी !

आओ प्रिये !
तुम्हें बताऊँ आज ये भी, कि
हमारे एहसासों का मिलना
और एकाकार हो जाना
कितना स्वार्गिक हो जाता है,
कितनी अनूठी हो जाती है
अनुभूतियों की वह दिव्यता,
जब हम परिणत होते हैं
--एक गन्धर्व-जोड़े में !
और तब,

तब सब कुछ पारलौकिक-सा हो जाता है ! 

Saturday, 3 September 2016

पड़ोस बदल रहा है !



मैं परेशान हूँ, क्योंकि
मेरा पड़ोस बदल रहा !
धीरे-धीरे ! लगातार !
बदलाव के छींटें मेरे दहलीज तक आ रहे हैं !

पड़ोस की स्त्री तराश रही है स्वयं को
और उसकी किरचें चुभ रही हैं
-पुरुष के पैरों में !
छैनी-हथौड़ी की आवाजें असह्य हो रही हैं,
पुरुष चाहता है शान्ति
वैसी ही, जैसी पहले हुआ करती थी !

टूट रहा है तिलिस्मों का घेरा
पड़ोस की स्त्री अब नहीं करती इंतज़ार
गर्म तवे और आटे की लोई के साथ,
एकनिष्ठ समर्पिता बदल रही है खुद को,
अब नहीं तलाशती,
राख में बचे हुए जिंदा कोयले !
और हाँ, उसने आज़ाद कर दिया है,
सीकड़ में बंधे झबरे कुत्ते को भी !

ख्वाहिशों की चाय खदकने लगी है
उसके मन में भी,
आँचल का दूध उतर आया है बोतलों में,
आँखों के पानी पर, पुल है धुप के चश्मों का !
क्लबों में रंगीन बत्तियां जल रही हैं
और उसमें चमक रहे हैं लिपस्टिक के निशान
--वोद्का और वाइन के गिलासों पर !

मेरा पड़ोस बदल रहा है !

धीरे-धीरे ! लगातार !

Friday, 2 September 2016

हम्म्म्म

hmmmm..
देवलोक में इंद्र की सभा सजी थी...इंद्र और सभी देवता अप्सराओं के नृत्य और गायन के आनंद में डूबे थे..अप्सराओं के सौन्दर्य पान की खुमारी अपने चरम पर थी कि तभी..देवर्षि नारद अपना करताल बजाते और नारायण नारायण जपते पहुँचे...थोड़े परेशान हाल दिखाई देते रहे थे ....
देवराज-आइये आइये देवर्षि नारद ..विराजिये. आप भी हमारे साथ नृत्य का आनंद लीजिये...
नारद-क्षमा करे देवराज...अभी अवकाश नहीं...परन्तु एक अत्यंत आवश्यक सूचना देनी थी आपको...
देवराज-कहिये देवर्षि ! क्या बात है आप कुछ चिंतित प्रतीत हो रहे हैं...
नारद- हाँ देवराज इंद्र ! आज मैं अपनी दैनिक उड़ान पर था...जब मैं पृथ्वी लोक से गुजर रहा था...कि तभी मुझे एक स्थान पर काफी भीड़ दिखी..मैं कौतुहल वश वहां लैंड कर गया और जब निकट पहुँचता हूँ तो आपको पता है, मैं क्या देखता हूँ...( सस्पेंस क्रिएट करने के लिए नारद ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी..)
देवराज-क्या..क्या देखा आपने देवर्षि..?
नारद-देवराज, वहां मैंने देखा रहा इंद्र की सभी सजी हुई थी..मेनका एवं रम्भा संग अन्य अप्सराएँ नृत्य कर रही हैं... देख कर मैं अचम्भित..
देवराज-(आवेश में अपने सिंघासन से खड़े हो गए) ये कैसे संभव है देवर्षि.. मैं यहाँ देवलोक में हूँ तो हमारी सभा पृथ्वी पर कैसे हो सकती है...और हमारी मेनका और रम्भा आदि अप्सराएँ भी यहीं हैं..फिर.. किंचित आपको भ्रम हुआ हो देवर्षि..
नारद-नहीं नहीं..मुझे भ्रम नहीं हुआ देवराज..एक्चुअली वहां एक माइथोलॉजी सीरियल की शूटिंग चल रही थी..
देवराज-(आश्चर्य से) माइथोलॉजी सीरियल की शूटिंग !! ये क्या होता है देवर्षि ?
नारद-रसरंजन देवराज रसरंजन !!
देवराज-रसरंजन !! वो कैसे ?
नारद-दरअसल जैसे देवलोक में मन बहलाने हेतु नृत्य-गायन-वादन आदि विधाएं हैं...वैसे ही धरती लोक पर भी कुछ विधाएं प्रचलित हैं.. जैसे, नाटक फ़िल्में एवं सीरियल वगैरह...और उन्हीं सीरियलों में एक विधा है माइथोलॉजी सीरियल...जिसमें देवों और देवलोक से जुडी मिथकों पर तैयार कथानकों पर संगीत, नृत्य,  गायन एवं अभिनय के द्वारा प्रस्तुतियां की जाती हैं..और इससे भू-लोक वासियों का मनोरंजन होता है..
देवराज-अच्छा!! ये तो बहुत ही अच्छी विधा है...और ये ख़ुशी की बात है कि हमारे देवत्व की तेजस्विता से वो स्वयं ही परिचित हो रहे हैं... और हमारे तेजोमय जीवन वृत्त से अभिभूत हो रहे हैं...
नारद-(हंस कर ) हाँ देवराज, समस्त देवों की तेस्विता की बातें उनसे छिपी नहीं हैं..
देवराज- देवर्षि तनिक उनके नृत्य एवं अभिनय के सन्दर्भ में तो बताएं.. क्या भू-लोक की सुंदरियाँ भी हमारी मेनका व रम्भा की टक्कर की होती हैं...?
नारद-एक सौ एक टका देवराज !! चाहें तो आप भी चल कर देख सकते हैं.. और उनके अभिनय के तो क्या कहने, देव और दानव तो छोडिये..वो तो पशु-पक्षियों का अभिनय भी इस कुशलता से से करते हैं कि  हमारे चन्द्र देव भी क्या करेंगे....
नारद के तंज से चन्द्र देव की भृकुटी तनती है..इंद्र सोचते हैं कहीं नारद के तंज के तीर उन तक न पहुँच जाए....रंगीन मिजाज़ इंद्र भू-लोक की सुन्दरियों के ख्याल में डूबे... मामले को रफा-दफा करने के चक्कर में नारद से पूछते हैं...
देवराज-परन्तु आपकी परेशानी का हेतु नहीं समझ सका..
नारद-वो ये है देवराज, कि जो कुछ वहां अभिनय द्वारा दिखाया जा रहा है...उसमें और वास्तविकता में काफी अंतर है...
देवराज-ओह! लेकिन ऐसा क्यों ?
नारद-कदाचित, माइथोलॉजी के राइटर शायद इंद्रलोक के सभा के गौरव और सौरभ से अनभिज्ञ हैं देवराज..
देवराज-तब क्या किया जाये..
वृहस्पति सुझाव देते हैं..
वृहस्पति-देवराज, क्यों ना उन राइटर्स को यहाँ बुला कर उन्हें यहाँ का गौरव दिखाया जाए..और सत्य से परिचित कराया जाए...
देवराज-गुरुदेव का सुझाव उचित जान पड़ता है नारद...
नारद को तभी कुछ याद आता है..वो अपने उत्तरीय में बंधे एक मोबाइल इंद्र को देते हुए कहते हैं..
नारद-ये भेंट मैं आपके लिए ख़ास भू-लोक से ले कर आया हूँ.. बड़े ही काम की चीज़ है ये...
देवराज-यह क्या देवर्षि ? इसका प्रयोजन क्या है ?
नारद-देवराज इसे मोबाइल फ़ोन कहते हैं...इससे कोई किसी से कितनी भी दूर रहे ..एक दूसरे को सन्देश पहुंचा सकता है ..और तो और बातें भी कर सकता है...जैसे अभी हम और आप कर रहे है...
देवराज-अच्छा!! वो कैसे..
नारद फ़ोन ओपरेट करने का तरीका समझाते हैं...
देवराज चित्रगुप्त को आदेश देते हैं.. राइटर्स को देवलोक में जल्दी से जल्दी बुलाया जाए...उन्हें जल्दी बुलाने के लिए नयी टेक्निक का सहारा लिया जाता है...और उन्हें sms के द्वारा आमंत्रित किया जाता है...उधर से काफी प्रतीक्षा के बाद जवाब आता है hmmmm... सभी परेशान होते हैं...
चित्रगुप्त-देवराज, उनका उत्तर हमें तो समझ नहीं आया...अगर देवर्षि समझ सकें...तो कृपया स्पष्ट करें...
नारद-नहीं चित्रगुप्त ये भाषा तो मुझे भी समझ नहीं आ रही...मैं बिलकुल परिचित नहीं हूँ.. कृपया देव गुरु वृहस्पति से सहायता ली जाए...
वृहस्पति-ये तो निश्चित कठिन है देवराज... मुझे लगता है हमें परम पिता ब्रह्मा के पास जाना चाहिए..उनसे सृष्टि के अणु मात्र का रहस्य भी छुपा हुआ नहीं.....
सभी ब्रह्मा के पास पहुँचते और उनसे अपनी उलझन सुलझाने का आग्रह करते हैं...
ब्रह्मा-मुझे इस लिपि का ज्ञान तो है..परन्तु इन लेटर्स का कॉम्बिनेशन मुझे समझ नहीं आ रहा है...अतः  मुझे लगता है इसका समाधान हमें भू-लोक पर ही मिलेगा... इसलिए देवर्षि को इसे लेकर भू-लोक पर जाना चाहिए और इसे उत्तर को समझने का प्रयत्न करना चाहिए... संभव है चाणक्य के नीतिशास्त्र में इसका विवरण मिल जाए...या फिर इस लिपि के किसी कोश में...ये पुस्तकें आपको किसी भी पुस्तकालय में मिल जाएँगी...
देवराज-देवर्षि, परम पिता किंचित उचित कर रहे हैं...आप इसे ले कर भू-लोक पर जाएँ..
अब नारद को टेंशन होने लगता है..बेकार इस झमेले में पड़ा..मोबाइल ले कर वो भूलोक पर आते हैं... और पूरा नीतिशास्त्र छान मारते हैं..कहीं उत्तर नहीं पाते हैं...डिक्शनरी देखते हैं जो मिलता है उससे भी उन्हें कुछ समझ नहीं आता....तभी कुछ विचार आता है उनके मन में और उसी शूटिंग साईट पर चल पड़ते हैं...चारों तरफ देखने के बाद सोचते हैं किससे पूछें..वैसे तो सभी हाथों में ऐसे यंत्र दिखाई पड़ रहे हैं..लेकिन कोई मुझे अनाड़ी समझ कर हंस न पड़े...इन विचारों खोये हुए रहते हैं कि एक ५-६ साल का बच्चा उनसे टकराता है...बच्चे के हाथ में एक मोबाइल है और वो उस पर गेम खेल रहा है...तुरंत उन्हें स्ट्राइक होता है इससे अच्छा सुपात्र मुझे नहीं मिल सकता...और वो उससे पूछ बैठते हैं...
नारद-ठहरो पुत्र !
बच्चा-क्या हुआ अंकल ?
नारद अपना मोबाइल दिखाते हुए पूछते हैं...
नारद-क्या तुम मुझे इसका मतलब समझा सकते हो पुत्र ?
बच्चा उन्हें ऊपर से नीचे देखता है..और कहता है..
बच्चा-क्या अंकल आप भी न..मोबाइल रखते हैं और sms की भाषा नहीं समझते...अरे अंकल, जब किसी को किसी बात के लिए जवाब न सूझे तो वो hmmmm लिख देता है....बस !!

नारद-ओह !!