जनता भाई चौक से गुजर रहे
थे. उनकी नज़र गयी अपने नियमित भिखारी पर, सिर पर सफ़ेद टोपी, मैली शर्ट और चेक की
लुंगी. और उसके सामने फैला था हरे साटन के कपड़े का टुकड़ा, जिसके किनारे जरी वाला
गोटा लगा था, जरी कहीं कहीं से उधड़ा हुआ था. वो हमेशा ऐसा ही दिखता. हाँ, हमेशा. नियमित
भिखारी जो था. भिखारी ने उन्हें देखा और अनदेखा कर गया. नज़र फेर ली उसने दूसरी ओर.
पहले सामने आने पर एक सलाम के साथ एक मुस्कान और आँखों में आग्रह होता था. पर आज
अजनबियत थी...सवाल था. पर क्या ? जनता भाई हैरान. जल्दी थी जाने की, पर, ठिठक गए
कदम वहीँ. उनसे ना किया गया अनदेखा इस अनदेखे को. सम्मुख खड़े हो गए भिखारी के....
‘क्यों भाई परेशानी है या
कोई नाराजगी ?’
‘नहीं बाबू, आपसे कैसी
नाराजगी.’
‘तो, ना दुआ ना सलाम ?’
‘आप तो हिन्दू लगते हैं
बाबू’
‘फिर क्या ? कल भी था, आज
नया तो नहीं हुआ ?’
‘पर अब तो वो बात नहीं रही.
अब तो आप हमें भीख ना देंगे और कुछ दिनों में हम शायद ले भी ना पायें.’
‘क्यों भाई, इसकी वजह ?’
‘सुना है कोई मोदी देश का
प्रधानमंत्री बन रहा है. इसकी वजह से बुद्धिजीवी देश छोड़ कर जा रहे हैं और हरे, नीले, पीले, भगवा, काले सब
रंगवाले खुश हो रहे हैं. टोपी की तो वो फ़िक्र करते नहीं. नौकरशाही जेब में. जो जेब
में ना समाये उसे कालापानी. अब तो कलम-कूची का भी डर नहीं होगा. सबकी रोटी सिकेंगी
पर हमारी रोटी तो और कम हो जाएगी ना बाबू ?’
‘लेकिन ये सब तुमको बताया किसने....और
तुम्हें पता है मोदी कौन है ?’
‘नहीं बाबू, ये मोदी कौन है
हमें क्या पता. ना भी पता चले तो क्या बात. क्या बदल जाना है. हमें तो बड़े फ़क़ीर ने
बताया ये सब..’
‘अच्छा !’
‘हाँ बाबू, उसने ये भी
बताया कि अब मुसलमानों का भीख मांगने का इलाका अलग होगा और हिन्दुओं का अलग. तब
मुसलमानों को सिर्फ मुसलमान से और हिन्दू भिखारियों को सिर्फ हिन्दुओं से भीख लेना
होगा...अगर किसी हिन्दू की भीख हमारी कटोरी में आ गयी तो हमें बिरादरी बाहर कर
देंगे.’
‘पर भीख का धर्म कैसे पता
चलेगा ?’
‘उन्हें पता चल जाएगा बाबू,
हम सब अल्लाह के निग़ाह में हैं.’
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