एक आवाज़ तेज़ और
कर्कश
कर्कशता पिघलती
है रुदन में और
रुदन पुकार में
बदलती है
पुकार गहराता
है
और करुण होता
जाता है !
एक कोशिश
लगातार
मन को उस पुकार
से हटाने की,
मन को बांधने
की कोशिश जारी है
चूल्हे और
कडाही के इर्द-गिर्द
लेकिन विचलन है
कि बढ़ती जा रही है
परन्तु अब मन
के साथ-साथ
हाथ-पैर भी
विद्रोह कर बैठते हैं,
और तब निकल पड़ी
उस करुण रुदन
से साक्षात्कार को !!
सामने एक
फटेहाल औरत
उम्र और चमक से
भरपूर,
शरीर पर लिपटा
एक चिथड़ा
और चिथड़े की
लम्बाई उतनी ही
कि वो, उसकी
औरत को ढक सके |
साथ में सात-एक
साल की बच्ची--पूर्णतः नग्न !
और उसकी नग्नता
को भस्म से छिपाने की कोशिश !
द्रवित मन चल
पड़ा दोनों को,
एक जोड़ी कपड़ों
से नवाज़ने,
फिर दो दिनों
की भूख
और उदर तृप्ति
की याचना,
उनका तन-मन
कितना तृप्त हुआ
पता नहीं, पर
मेरा मन
अब संतुष्ट और
तृप्त है !
अब आधी-अधूरी
रसोई को
पूरा करने की
जल्दी,
तभी नमक की
खाली बर्नी देखकर
चल पड़ी चौक तक,
नमक के साथ-साथ
बच्चों के लिए
कुछ बिस्किट और
कूकीज़ भी
खरीद लेती हूँ,
तभी, एहसास
होता है कि जैसे
कोई मेरा
दुप्पटा खींच रहा हो,
नज़रें हैरान और
मन आवाक्,
उन दोनों को एक
बार फिर
उसी पुराने वेष
में देख कर !
वो एक बार फिर
से तैयार थीं
एक नए लक्ष्य
की तलाश में,
और मैं उनके
लिए थी एक नया लक्ष्य
अपने बदले
लिबास में !
अब वो
वस्त्रहीना
दो नहीं तीन
दिनों से भूखी थीं,
और थी कांख में
दबी एक पोटली !
मन कडवाहट से
भर गया,
उस वेष की
विवशता को देखकर
और देख कर कि
एक साथ कई-कई
कुटिल-कुत्सित
और तृषित नज़रें भी
उसकी हया के
तार को झनझना नहीं पा रहीं,
इस भूख-भीख और
याचना
की नदी में
कैसे तर्पित हो गई हैं उनकी आत्मा !
उनके वितनु
होने का भाव ही है, जो
मौसम की मार और
नज़रों की धार
दोनों को ही
बेअसर कर रहा है,
और यह सब
इसलिए, कि
करुणा की गंगा
भी तभी बहती
जब याचक
दीन-हीन और विवश-विवर्ण हो !
इसीलिए, ये वेष
ही ,
उनके जीवन की
सच्चाई और नियति है !!
बहुत भाव विह्वल कर देने वाली अभिव्यक्ति है.
ReplyDeleteबहुत मार्मिक
साधुवाद स्वीकार कीजिए
शुक्रिया प्रकाश गोविन्द जी.
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