उन स्वघोषित श्रेष्ठ लिंगियों
को सादर समर्पित, जो अपने अठ्घंटिया नौकरी या अपने काम और कमाई के रौब का झंडा
लहराते हुए चौबीस घंटे की बेगार तैनाती और घड़ी की सुईयों पर नटों सी कलाबाजी
दिखाती अपनी बीवियों की तमाम खूबियों को खारिज करते हुए, कहते हैं.....
अरे यार ! तुम भी न !
क्या कहती हो थकान..थकान !
कर लेना आराम कभी भी,
तुम घर में ही तो रहती हो !
चले जाना बाज़ार खुद ही
ले आना घर का सामान
करना ही क्या है,
तुम घर में ही तो रहती हो !
बिजली का हो, या बिल हो पानी
का
करना बड़ा ये काम आसान
कल तक तुम ये भर देना
साथ ही फोन का बिल दे आना,
तुम घर में ही तो रहती हो !
चक्की से गेहूँ पिसवाना,
बच्चों को टीका लगवाना,
ऊँगली पकड़ स्कूल से लाना,
कलम पकड़ के क लिखवाना,
मर्दों का है काम भला ?
कर लेना खुद ही ये सब
तुम घर में हो तो रहती हो !
मत भूलना अम्मा की दवाई
और बाबूजी का चश्मा बनवाना,
झाड़ू-पोछा हो, या कपड़ा
बर्तन ही
क्या ये है कोई काम भला ?
आज रात कुछ ख़ास पकाना,
तुम घर में ही तो रहती हो !
धोबी दर्जी या पंसारी
सबकी दुकानें आस-पास हैं
वक़्त निकाल पैंट ठीक करवा
लेना,
घर में बैठ कर समय गंवाना
अच्छी नहीं है बात कोई,
सुबह-शाम की सैर कर आना
तुम घर में ही तो रहती हो !
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