Friday, 4 October 2013

घर में ही तो रहती हो !

उन स्वघोषित श्रेष्ठ लिंगियों को सादर समर्पित, जो अपने अठ्घंटिया नौकरी या अपने काम और कमाई के रौब का झंडा लहराते हुए चौबीस घंटे की बेगार तैनाती और घड़ी की सुईयों पर नटों सी कलाबाजी दिखाती अपनी बीवियों की तमाम खूबियों को खारिज करते हुए, कहते हैं.....

अरे यार ! तुम भी न !
क्या कहती हो थकान..थकान !
कर लेना आराम कभी भी,
तुम घर में ही तो रहती हो !

चले जाना बाज़ार खुद ही
ले आना घर का सामान
करना ही क्या है,
तुम घर में ही तो रहती हो !

बिजली का हो, या बिल हो पानी का
करना बड़ा ये काम आसान
कल तक तुम ये भर देना
साथ ही फोन का बिल दे आना,
तुम घर में ही तो रहती हो !

चक्की से गेहूँ पिसवाना,
बच्चों को टीका लगवाना,
ऊँगली पकड़ स्कूल से लाना,
कलम पकड़ के क लिखवाना,
मर्दों का है काम भला ?
कर लेना खुद ही ये सब
तुम घर में हो तो रहती हो !

मत भूलना अम्मा की दवाई
और बाबूजी का चश्मा बनवाना,
झाड़ू-पोछा हो, या कपड़ा बर्तन ही
क्या ये है कोई काम भला ?
आज रात कुछ ख़ास पकाना,
तुम घर में ही तो रहती हो !

धोबी दर्जी या पंसारी
सबकी दुकानें आस-पास हैं
वक़्त निकाल पैंट ठीक करवा लेना,
घर में बैठ कर समय गंवाना
अच्छी नहीं है बात कोई,
सुबह-शाम की सैर कर आना
तुम घर में ही तो रहती हो !



Friday, 20 September 2013

सब अल्लाह के निग़ाह में हैं



जनता भाई चौक से गुजर रहे थे. उनकी नज़र गयी अपने नियमित भिखारी पर, सिर पर सफ़ेद टोपी, मैली शर्ट और चेक की लुंगी. और उसके सामने फैला था हरे साटन के कपड़े का टुकड़ा, जिसके किनारे जरी वाला गोटा लगा था, जरी कहीं कहीं से उधड़ा हुआ था. वो हमेशा ऐसा ही दिखता. हाँ, हमेशा. नियमित भिखारी जो था. भिखारी ने उन्हें देखा और अनदेखा कर गया. नज़र फेर ली उसने दूसरी ओर. पहले सामने आने पर एक सलाम के साथ एक मुस्कान और आँखों में आग्रह होता था. पर आज अजनबियत थी...सवाल था. पर क्या ? जनता भाई हैरान. जल्दी थी जाने की, पर, ठिठक गए कदम वहीँ. उनसे ना किया गया अनदेखा इस अनदेखे को. सम्मुख खड़े हो गए भिखारी के....
‘क्यों भाई परेशानी है या कोई नाराजगी ?’
‘नहीं बाबू, आपसे कैसी नाराजगी.’
‘तो, ना दुआ ना सलाम ?’
‘आप तो हिन्दू लगते हैं बाबू’
‘फिर क्या ? कल भी था, आज नया तो नहीं हुआ ?’
‘पर अब तो वो बात नहीं रही. अब तो आप हमें भीख ना देंगे और कुछ दिनों में हम शायद ले भी ना पायें.’
‘क्यों भाई, इसकी वजह ?’
‘सुना है कोई मोदी देश का प्रधानमंत्री बन रहा है. इसकी वजह से बुद्धिजीवी देश छोड़ कर जा रहे हैं और हरे, नीले, पीले, भगवा, काले सब रंगवाले खुश हो रहे हैं. टोपी की तो वो फ़िक्र करते नहीं. नौकरशाही जेब में. जो जेब में ना समाये उसे कालापानी. अब तो कलम-कूची का भी डर नहीं होगा. सबकी रोटी सिकेंगी पर हमारी रोटी तो और कम हो जाएगी ना बाबू ?’
‘लेकिन ये सब तुमको बताया किसने....और तुम्हें पता है मोदी कौन है ?’
‘नहीं बाबू, ये मोदी कौन है हमें क्या पता. ना भी पता चले तो क्या बात. क्या बदल जाना है. हमें तो बड़े फ़क़ीर ने बताया ये सब..’
‘अच्छा !’
‘हाँ बाबू, उसने ये भी बताया कि अब मुसलमानों का भीख मांगने का इलाका अलग होगा और हिन्दुओं का अलग. तब मुसलमानों को सिर्फ मुसलमान से और हिन्दू भिखारियों को सिर्फ हिन्दुओं से भीख लेना होगा...अगर किसी हिन्दू की भीख हमारी कटोरी में आ गयी तो हमें बिरादरी बाहर कर देंगे.’
‘पर भीख का धर्म कैसे पता चलेगा ?’

‘उन्हें पता चल जाएगा बाबू, हम सब अल्लाह के निग़ाह में हैं.’ 

Tuesday, 17 September 2013

खुद के खिलाफ

एक आवाज़ तेज़ और कर्कश
कर्कशता पिघलती है रुदन में और
रुदन पुकार में बदलती है
पुकार गहराता है
और करुण होता जाता है !
एक कोशिश लगातार

मन को उस पुकार से हटाने की,
मन को बांधने की कोशिश जारी है
चूल्हे और कडाही के इर्द-गिर्द

लेकिन विचलन है कि बढ़ती जा रही है
परन्तु अब मन के साथ-साथ
हाथ-पैर भी विद्रोह कर बैठते हैं,
और तब निकल पड़ी
उस करुण रुदन से साक्षात्कार को !!

सामने एक फटेहाल औरत
उम्र और चमक से भरपूर,
शरीर पर लिपटा एक चिथड़ा
और चिथड़े की लम्बाई उतनी ही
कि वो, उसकी औरत को ढक सके |

साथ में सात-एक साल की बच्ची--पूर्णतः नग्न !
और उसकी नग्नता को भस्म से छिपाने की कोशिश !
द्रवित मन चल पड़ा दोनों को,
एक जोड़ी कपड़ों से नवाज़ने,
फिर दो दिनों की भूख
और उदर तृप्ति की याचना,
उनका तन-मन कितना तृप्त हुआ
पता नहीं, पर मेरा मन
अब संतुष्ट और तृप्त है !

अब आधी-अधूरी रसोई को
पूरा करने की जल्दी,
तभी नमक की खाली बर्नी देखकर
चल पड़ी चौक तक,
नमक के साथ-साथ बच्चों के लिए
कुछ बिस्किट और कूकीज़ भी 
खरीद लेती हूँ,

तभी, एहसास होता है कि जैसे
कोई मेरा दुप्पटा खींच रहा हो,
नज़रें हैरान और मन आवाक्,
उन दोनों को एक बार फिर
उसी पुराने वेष में देख कर !

वो एक बार फिर से तैयार थीं
एक नए लक्ष्य की तलाश में,
और मैं उनके लिए थी एक नया लक्ष्य
अपने बदले लिबास में !
अब वो वस्त्रहीना
दो नहीं तीन दिनों से भूखी थीं,
और थी कांख में दबी एक पोटली !
मन कडवाहट से भर गया,
उस वेष की विवशता को देखकर
और देख कर कि एक साथ कई-कई
कुटिल-कुत्सित और तृषित नज़रें भी
उसकी हया के तार को झनझना नहीं पा रहीं,
इस भूख-भीख और याचना
की नदी में कैसे तर्पित हो गई हैं उनकी आत्मा !

उनके वितनु होने का भाव ही है, जो
मौसम की मार और नज़रों की धार
दोनों को ही बेअसर कर रहा है,
और यह सब इसलिए, कि
करुणा की गंगा भी तभी बहती
जब याचक दीन-हीन और विवश-विवर्ण हो !
इसीलिए, ये वेष ही ,

उनके जीवन की सच्चाई और नियति है !!