माँ
ओ
प्यारी माँ !
बड़ी
भोली है तू ,
सदियों
से सौंपती आई है खुद को विरासत के रूप में ,
अपनी
अगली पीढ़ी को ,
आज
हम दफ़न करते हैं तेरी विरासत,
....ससम्मान
!
क्षमा
करना माँ,
तेरी
सीख, तेरी मिशाल, नहीं दे सकते हम
अपनी
अगली पीढ़ी को !
नहीं
गुनगुना सकते ख़ामोशी के गीत
नीची
नजरों के घाव गहरे हो गए हैं
नहीं
सह सकते अब,
लिजलिजी
विचारों और बजबजाती नज़रों के भिनभिनाहट को
इनको
ताड़ना भी हमारी ही ताड़ना है....
हम
बगावत करते हैं आज
तेरी
संस्कारों से, तेरे जैसे अस्तित्व से
तेरे
क़त्ल का सामान तेरे गहने बन गए
तू
तेरी ही विशालता में विलीन कर दी गयी
शून्य
में समा गयी शून्य छोड़ कर....!
अनुशरण
की गति भी कोई गति है माँ,
एक
पिंजरा है ये
और
पिंजरे की गति कैसी..?
तेरी
अग्नि परीक्षा भी तेरे काम न आई
तेरे
सम्पूर्ण त्याग और समर्पण का प्रत्युत्तर था--एक वार !
जो
तेरी पीठ पर हुआ – धोखे और निर्वासन का !
फिर
भी तूने दिया ही,
और
समा गयी धरती में – निःशब्द !
छोड़
कर एक चिर-प्रश्न !
छद्म-भोर
और छद्म-भेष का भ्रम दोनों का
छले
गए दोनों ही, साक्षी पूरी सृष्टि
फिर
शिला बन सजा तूने क्यों पाई ?
दंड
का अधिकारी था वो,
जिसे
तेरी रक्षा का अहंकार था, या फिर वो ,
जिसने
अपराध किया था....
ज्ञात
है, तू अब भी निःशब्द है !
वर्जनाओं
ने लील लिया है तेरे शब्दों को, तेरी आवाज़ को !
वर्जनाओं
की दीवार विरासत है तेरी
कोई
कमी ना रखी तूने भी उसे और ऊँचा करने में,
पर
माँ, वर्जनाओं का आदर्श और उनका अनुपालन तो समान होना चाहिए न..?
इसलिए
माँ, आज त्यागते हैं ये पिंजरा भी,
अब
अपनी गति होगी हमारी
अपना
लय होगा,
सहर्ष
आमंत्रित हैं वो जो सहयात्री बनना चाहें..
हम
स्वयं लेंगे अपनी धरती की गहराई और
अपने
आकाश के असीमता की थाह !
और
सीचेंगे इन्हीं से अपनी जड़ों को भी,
इंसान
इंसान के बीच का भेद ना होगा तब,
देह
की दुनिया से परे जीना सीखाएँगे हम—अपनी अगली पीढ़ी को !


