गाँव की बहुएं -1
गर्मी की तपती
दोपहरी
महुए की मीठी और तेज़
गंध
अकुलाहट भरती गंध की
तीव्रता
और फिर वो खोजने
लगतीं हैं
अपने फैलते-सिकुड़ते नथुने
के लिए
एक कोना !
घर की चारदीवारी में
फंसी बहुएं
कभी मुंह अँधेरे, तो
कभी सांझ ढले
ले आतीं हैं छत पर
से
फेफड़ा भर साँसें !
और उसी ताज़गी के
भरोसे
तैयार हो जातीं हैं
फेटा मार के
एक और दिन गुजार
देने के लिए !
छोटी सी दुनिया,
लम्बी सी ज़िन्दगी !
आँगन से सीढ़ी, सीढ़ी
से छत !
छत से सीढ़ी, सीढ़ी से
आँगन !
.........और एक
ज़िन्दगी !
हासिल बैंड-बाजे
वाली शव-यात्रा !
2.
गाँव की बहुएं
जन्म लेती हैं जहाँ,
जिस घर में
रखा जाता है उन्हें,
फूलों की तरह संभाल के
और अपने ही घर में
बसर करती हैं जिंदगी
मेहमानों जैसी
फिर विदाई पुरे
दुलार-प्यार की !
हर सांस, हर कौर के
साथ
संस्कारित होती हैं
लड़की होने के गुणों
से
तपाया जाता है
उन्हें सोने सा
कि, कुंदन बन चमकाना
है
उन्हें अपने ससुराल
को !
और तैयार की जाती
हैं
अस्थि-मज्जा-मांस से
बनी पुतलियाँ !
पुतलियाँ ! हाँ
पुतलियाँ !
रीढ़-विहीन पुतलियाँ
!
सिर्फ एक लोथ
पुतलियाँ !
किसी भी खाँचें में
ढल-फैल जाने वाली पुतलियाँ !
सपनों की रंगीन
बिंदी माथे पर सजाये
भेज दी जाती हैं –
अपने घर !
अपना घर ? आगंतुकों
का अपना घर !
जो कभी नहीं होता
अपना
पर अपनाने की पूरी
कीमत वसूलते हैं
बदन के रोयें-रोयें
से !
होती हैं बस उपजाऊ
ज़मीन भर
जहाँ फसलें बोयी,
उगाई और काटी भर जाती हैं
खाद-पानी उतना ही कि
उर्वरता बनी रहे !
तरसती रहें जीवन भर,
भले ही एक नथ को
पर उनके शैय्या-दान
पर, बड़े सम्मान से
सोने की जंजीर चढ़ा
दी जाती है !
उम्र गुजार देती हैं
कथरी पर
भूमि-शयन करते-करते,
पर स्वर्ग में सुख
से सोने को
एक अदद रानी-पलंग
साथ अवश्य ले जाती हैं !
कसकती रह जाती हैं
उम्र भर
एक कजरी तक न गा
पातीं हैं,
लेकिन तन से साँसों
के निकलते ही
बैंड-बाजे के ढमा-ढम
से
पूरा गाँव हिला
जातीं हैं !
3.
बड़ा भेद होता है,
बहुओं बहुओं में भी
कुछ बहुएं होती है
दीवारों के बीच
भटकती आत्मा सी,
कुछ होतीं हैं खुले
आसमानों में
चौहद्दियां नापतीं !
अब सवालों में आता
है
कौन अगड़ा और कौन
पिछड़ा ?
वो जिनके सर पर
गट्ठर
पीठ पर बंधे होते
हैं बच्चे
और कमर में खुंसा
होता है एक हंसुआ !
कदम-दर-कदम सीमाओं
को लांघती
नहीं पालतीं कमतर
होने का एहसास भी
और खींच लेतीं हैं
हंसुआ, कटार की तरह !
या वो, जो दांतों
में पल्लू दबाये
भागती-दौड़ती रहतीं
कुलीनता की सीमाओं
के भीतर
जिम्मेदारियों की
पोटली कांख में दबाये
जिनके पावों के पाजेब
की रुनझुन भी
दीवारों के पार नहीं
जा पातीं !
जिनके साँसों का हर
तार गाता है
एक ही गीत—
“हम कुलीन बहुओं को
दीवारों में घुटना है
अच्छी छोटी जात की
बहुएं
जिन्हें खुले
आसमानों में हँसना है !
हर बहुओं का बसेरा
तो नीच कुल ही होना था
कुलीनों के घर में
तो सिर्फ बेटों को रहना था !

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