Wednesday, 8 November 2017

लक्ष्मण रेखा शक्ति या वर्जना का प्रतीकात्मक संधान !!

लक्ष्मण-रेखा शक्ति या वर्जना का प्रतीकात्मक संधान।

आज नारी अपनी किसी भी अवस्था में, शिशु, बालिका, किशोरी, युवती या फिर वृद्धा ही, सुरक्षित नहीं और न ही किसी स्थान पर चाहे वह सड़क हो, बस, ऑफिस या सार्वजनिक स्थल ही क्यों न हो। कभी-कभी तो अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं। ऐसे में 'घर में अकेले बानी, ईश्वर जी राख पानी'.... भिखारी ठाकुर के एक गीत 'करिके गवनवा भवनवा में छोड़ी कर..' से इस पंक्ति को पढ़ यही लगता है कि नारी मन में अकेले होने पर रावण का भय हमेशा से ही रहा है। तत्समय और कालानुरूप कुछ सीमाओं एवं उपायों को तय कर सुरक्षा की व्यवस्था की गई। कालक्रम के साथ ऐसे भय और उसका स्वरूप बदलता गया। ऐसे में ये सीमाएं, वर्जनाओं  एवं रूढ़ियों में बदलती गयी।
सीता हरण और लक्ष्मण रेखा के संबंध में भी एक ख्याल मन में आता है वो ऐसी कौन सी रेखा बनाई होगी लक्ष्मण ने जिसे रावण पार करता तो भस्म हो जाता और सीता सहज पार कर भिक्षा दे आती हैं। जहां तक पढ़ा है ऐसी कोई शक्ति या दैवीय सिद्धि का जिक्र कहीं नहीं मिलता है जो लक्ष्मण के पास हो जिसका प्रयोग कर, दैवीय सिद्धि से वह रेखा बनाई हो। हां, बला-अतिबला नाम की शक्ति/शिक्षा महर्षि विश्वामित्र ने राम लक्ष्मण दोनों को ही दी, जिससे ताड़का वन में वे स्वयं की रक्षा ताड़का से अपने बचाव के लिए कर सकें। क्योंकि जंगल में कब और कहाँ उसका हमला हो जाय, कहना कठिन था। लेकिन विश्वामित्र को उसकी प्रकृति और तरीके का पता रहा होगा। और वो शक्ति कोई खास युद्ध तकनीक रही होगी। खैर, तो फिर से बात वहां आ ठहरती है कि क्या सच में लक्ष्मण के पास ऐसी कोई शक्ति थी या फिर हम जिस लक्ष्मण-रेखा को पढ़ते सुनते आ रहे हैं वह मात्र किसी वर्जना का प्रतीकात्मक संधान है !?!?!

--सुमन उपाध्याय 

Sunday, 18 June 2017

एक कविता - पिता के नाम !



पापा मतलब सादगी
पापा मतलब हिम्मत
पापा मतलब धैर्य
पापा मतलब संयम
पापा मतलब मुस्कराहट
पापा मतलब भय
पापा मतलब त्याग
पापा मतलब स्थितप्रज्ञ !!

इन पंक्तियों में मेरे पिता का पूरा व्यक्तित्व छिपा है. संभवतः उन्हें समझने के लिए एक बार पुनः मेरी उन स्मृतियों में झांकना होगा, जो हमेशा ही कठिन से कठिन परिस्थियों में मेरा वैचारिक और भावनात्मक संबल बना रहा.

मेरे लिए पापा का मतलब वो पुत्र,
जिसके सामने मानसिक असंतुलन के शिकार पिता का पुत्र हो जाना.
ऑफिस से लौटकर, जूता और खाने का डिब्बा यथास्थान रख;
सबसे पहले पिता का हाल पूछना. फिर,
पुत्र हुए पिता का,
मासूमियत से दिनभर की शिकायतों और इच्छाओं का पुलिंदा खोलना.
पापा का शांतचित हो सुनना, उचित आश्वासन दे संतुष्ट करना.
कभी-कभी असंतुलन की अवस्था में स्व-मल द्वारा गन्दा किये दीवार को अपने हाथों साफ़ करना.
यह जानते हुए कि कुछ हासिल नहीं,
उन्हें कभी पुचकार कर तो कभी झूठा गुस्सा दिखा समझाना.

पापा का मतलब वो पिता,
जिसके लिए एक तरफ दरवाज़े पर बेटी की बारात और दूसरी तरफ
जीवन-मृत्यु के बीच झूलता दुर्घटनाग्रस्त छोटा ‘सौतेला’ भाई.
घर में बेटी की शादी-कन्यादान और अस्पताल में
न्यूरोसर्जन द्वारा किया जा रहा १४ घंटे लम्बा ऑपरेशन.
इधर शादी संपन्न उधर ऑपरेशन.
कुछ घरातियों को छोड़ सारे बाराती और मेहमानों की अनभिज्ञता.
कुछ न कुछ तो थोड़ा-थोड़ा...... ‘लड़केवालों का हठ तो शगुन’
पिता का शांतचित सब संभालना...
बेटी किंकर्तव्यविमूढ़... पिता स्थितप्रज्ञ !!

ऐसी कई और अनमोल स्मृतियाँ हैं पापा की जिसने एक पिता को, पिता की ऊंचाई से कहीं ऊँचा रखा है.

लव यू पापा.

Saturday, 15 April 2017

यह जीवन है।


बांधो,
तुम बांध बांधो,
बुद्धि की तीक्ष्णता पर,
मन की खुली चाहतों पर,
आंखों में पलते सपनों पर,
स्वयं पर स्वयं के अधिकार पर,
और
बहने दो सिर्फ कलकल कोमलता।
सौम्य सेवाभाव की सर्वसुलभता।
पर हां,
आवेगों को मरने न देना।

यह जीवन नहीं, प्रवंचना मात्र है।

कान दो !
स्मरण रखना; आवेगों का दबाव बढ़ेगा
और बढ़ेगा
और बढ़ेगा,
टूटेंगे एक-एक कर सारे बांध
जलजला आएगा
तुम उत्सव मनाना,
तुम्हारा व्यक्तित्व
रचेगा अप्रच्छन्न अस्तित्व
तुम मंत्र पढ़ना
चाक चलाना और
छेनी-हथौड़ी के संगीत पर नर्तन करना
फिर,
पसीने से लथपथ
एकांत में,
पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी पर बांसुरी बजाना।

यह तो बहकी-बहकी बातें है।

क्यों, नहीं बहकना तुम्हें ?

यह तो आत्म-प्रवंचना है।

नहीं, यह जीवन है।