Saturday, 5 November 2016

डायरी का एक पन्ना....



१३/१०/१६
                      

दिन का सपना

आज दोपहर घर में अकेली थी. मंटो पर लिखे एक लेख पढ़ रही थी... आँखें बोझिल सी होने लगीं. आधे घंटे के लिए आँख लग गयी.
देखा मेरे फिश टैंक की सबसे बड़ी मछली अपने टैंक की छत में बने सूराख से झांक रही है. मैं ये सोच ही रही थी कि ये क्या कर रही है..उसने वहां से छलांग लगा दी. मैंने देखा उसे छलांग लगाते. लेकिन मुझे जरा भी घबराहट नहीं हुयी.. मैं जनती थी ये बड़ी जीवट वाली है- मरेगी नहीं | मैं भी उसे वहां ऐसे ही छोड़ एक हल्के हरे रंग के प्लास्टिक के मग में पानी लेकर आई. उसे वहां से उठा कर उसकी मुंह की तरफ से पानी में डूबोया कि जल्दी से सांस ले सके. गुड़गुड़ सी हुयी. लगा उसे रहत मिली. मैंने कहा – ये क्या सूझी तुझे ? अच्छी-भली इतने बड़े टैंक में मजे कर रही थी..क्यूँ कूदी ? वो कुछ नहीं बोली, बस फिर से मग के सिरे से झाँकने लगी. इससे पहले मैं कुछ समझ पाती वो फिर से कूद गयी. मैंने लपक के उसे उठाया, और डाँटते हुए फिर से उसे मग वाले पानी में डाल दिया. मैंने देखा मछली के साइज़ के हिसाब से मग और उसका पानी काफी नहीं था. लेकिन कूदी तो वो उस बड़े टैंक में से भी थी.
‘क्यूँ मरना चाहती है ?’
मछली हंसी. फिर से कूदी और तभी मैंने देखा वो हवा में तैरने लगी, बिलकुल वैसे ही जैसे पानी में तैर रही थी. जैसे उसके लिए हवा और पानी का भेद मिट गया हो.
हाय !!
‘ये कैसे किया तूने ?’
वो खिलखिला पड़ी.
लेकिन अन्दर के डर ने जोर मारा और फिर से मैंने उसे पकड़ के उसी मग वाले पानी में डाल दी. अब तो ये खेला हो गया हम दोनों का. वो बार-बार हंस कर भाग जाती और मैं उसे पकड़ के उसी मग में डालती.  
तभी उसकी खिलखिलाहट रुक गयी, मैंने एक बढ़ा हुआ हाथ देखा जिसने एक काली मछली, सूई जैसी मुंह वाली, उस मग वाले पानी में डाल दिया.
बस, मेरी नींद खुल गयी |

3 comments:

  1. I can see the metaphor being used here indeed we all wish to be free.

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    1. yes vandana, we all wish to be free. need to be free.

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  2. मेरे फिश टैंक की वो सबसे प्यारी मछली थी.
    मर गयी !
    वो बड़ी ही नाजुक थी
    दो दिन भी अकेले ना रह पाई
    मर गयी !
    उसे अकेलेपन को एकांत में बदलने का हुनर आया ही नहीं|

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