Tuesday, 1 November 2016

कहानी - शय्यादान


                                        


खम्भे की ओट लिए निर्लिप्त भाव से बैठी भव्या आँगन में आये सारे रिश्तेदार, पड़ोसियों और अपनी माँ के एकादशाह का श्राद्धकर्म एकटक देख रही थी. जैसे देख कर भी कुछ नहीं देख रही हो. स्मृतियों में बसी उसकी मां की तस्वीर सामने रखी थी. उस तस्वीर को देखते-देखते अचानक उसे लगा था जैसे निष्प्राण तस्वीर में समायी उसकी माँ किसी भंवर सी जागृत हो उठी हो और उस भंवर में उसका सारा वजूद डूबता जा रहा हो. यह क्षणिक स्थिति थी. अगले ही पल उसे लगा था जैसे उसकी माँ उसके सामने खड़ी हो, साक्षात्.. सशरीर... मंद मंद मुस्कुराती. अपनी माँ की यह मीठी मुस्कान उसे खींच ले गई थी अतीत की अतल गहराइयों में. जहाँ माँ एक हंसती बोलती, सबका ख्याल रखती एक अनुपम और सजीव व्यक्तित्व थी ..समस्त सांसारिक दुखों को सहती, फिर भी हरदम मुस्कुराती माँ.
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हफ्ते भर पहले बुआ अपने दोनों बच्चों के साथ छुट्टियाँ बिताने आई थी. बच्चों ने खजुराहो घुमाने की जिद की थी. उन्हें पता था कि मामा उनकी जिद खाली नहीं जाने देंगे. ऐसा ही हुआ, मामा ने मान ली उनकी बातें. दो दिनों बाद जब निकलने का समय हुआ तो कई दिनों से बीमार भव्या की माँ ने सच्चिदानंद से कहा था –

‘देखिये, कई दिनों से हमारी तबियत ठीक नहीं चल रही है. अभी आप कहीं दूर ना जाएँ तो अच्छा रहेगा. बहुत कमजोरी सी लगती है. लगता है कि किसी बड़े डॉक्टर को दिखा लेना चाहिए..’
‘अरे ये भी कोई बीमारी है, और वैसे भी घर में अम्मा हैं ही और अभी तो दीदी भी आ गई है. अगर ऐसी कोई ज़रुरत पड़ गई तो गाँव में डॉक्टर है ना, बुलवा लेना. हम यहाँ रह कर भी क्या करेंगे जो भी करना होगा डॉक्टर ही करेगा ना...’

सच्चिदानंद ने लापरवाही से जवाब दिया था.

‘पता नहीं क्यों, मेरा मन बहुत घबरा रहा है, हम चाहते हैं कि आप हमारे साथ ही रहते...घूमना फिरना तो बाद में भी हो सकता है.’
‘ऐसा क्या हो गया है...अरे, एक हफ्ते की तो बात है. बच्चे हैं, छुट्टी में आये हुए हैं, कुछ दिन साथ रहेंगे, घूमेंगे-फिरेंगे.....कौन रोज़-रोज़ आते हैं...’
इस बार सच्चिदानंद थोड़ा चिढ़ते हुए बोले थे..
‘ठीक है जैसा आप ठीक समझें’ – कहती हुई भव्या की माँ कमरे से चली गई थी.

संयोग से दरवाज़े पर खड़ी भव्या ने सब सुन लिया था. माँ कमरे से बाहर निकलने लगी थी तो उसकी नज़र भव्या पर पड़ी थी, माँ कुछ पूछे इसके पहले भव्या ने कहा था...
‘हम बाउजी से बात करते हैं..’
‘ना ना ..क्या बात करनी है, तेरे बाउजी समझदार हैं...कुछ सोच कर ही ऐसा बोले होंगे, तू चल यहाँ से.’  
कहते हुए भव्या को लेकर वो वहां से चली गई थी.

सच्चिदानंद बच्चों को लेकर चले गए थे घूमने-घुमाने. भव्या को भी चलने को कहा था पर उसने साफ़ मना कर दिया था. भव्या को जिसकी आशंका थी सच हो गयी, उनके जाने के दूसरे दिन से ही माँ की तबियत बिगड़ने लगी थी. चौथे दिन सुबह जब माँ देर तक सोती रही तो भव्या खोज खबर लेने माँ के कमरे में पहुंची थी. माँ का शरीर निस्पंद देख कर उसने उसे बेसब्री से झकझोर कर जगाने की कोशिश की थी. लेकिन माँ के शरीर में कोई हरकत नहीं हुई थी. भव्या घबरा कर भागती हुई गाँव के डॉक्टर को बुलाने चली गई. संयोग से डॉक्टर साहब घर पर ही थे और भव्या की घबराहट देख कर तुरंत उसके साथ चल पड़े थे. घर पहुँच कर वह सीधे बिस्तर पर पड़ी माँ के पास रुके और पहली नज़र में स्थिति की गंभीरता भांप ली थी. माँ की नब्ज़ टटोलते हुए उन्होंने कहा था...

‘हालत ख़राब है, जल्दी से बड़े हॉस्पिटल ले जाना पड़ेगा. बनारस ले कर जाएँ तो ज्यादा अच्छा रहेगा. वैसे सच्चिदानंद जी कहाँ हैं ?’

इससे पहले की कोई कुछ कहता भव्या गुस्से में बोल पड़ी थी –
‘वे नही हैं ...सैर-सपाटे पर गए हैं..लेकिन कोई बात नही ..हम ले जायेंगे अम्मा को बनारस..

पास खड़ी उसकी दादी और बुआ उसकी बात सुन कर आवाक् रह गए थे. शायद कोई और समय होता तो भव्या की बदतमीजी पर उसे उनकी फटकार सुननी पड़ती. लेकिन वक़्त और उसकी भावनाओं को समझते हुए किसी ने कुछ नहीं कहा. डॉक्टर भी हैरानी से भव्या की ओर देखते हुए बोले थे,  

‘चलो हम भी चलते हैं, हमसे जितनी मदद हो सकेगी करेंगे.’

आनन-फानन में भव्या अपनी माँ को लेकर, अपनी बुआ और डॉक्टर के साथ बनारस पहुँची थी. बी येच यू हॉस्पिटल के डॉक्टर ने देखते ही कहा था

‘पीलिया एडवांस स्टेज में पहुँच चुका है... कुछ कहना मुश्किल है, फिर भी हम कोशिश करते हैं.’

भव्या हताश सी बैठ गई थी. उसे अपने बाबू जी पर बहुत कोफ़्त हो रहा था. लेकिन अब इससे कोई फायदा नहीं होने वाला था. बुआ ने जल्दी से बाउजी को खबर भिजवा दी थी . इधर भव्या की माँ की तबियत लगातार बिगड़ती जा रही थी. वो बार-बार सच्चिदानंद के बारे में पूछती जैसे उसे आभास हो गया था कि अब उसके जीवन के ज्यादा दिन नहीं बचे हैं. माँ की बढ़ती बेचैनी देखकर भव्या बार बार समझाती, ‘अम्मा, तुम चिंता मत करो, बाउजी जल्दी ही आ जायेंगे और तुम जल्दी ठीक हो जाओगी.

माँ बड़ी मुश्किल से कहती –‘अब ठीक क्या होंगे, बस प्रान छूटने के पहले वो आ जाएँ.. कहीं ऐसा न हो उनके आते- आते देरी हो जाए....अच्छा हुआ कि बनारस आ गए.... मुक्ति मिल जाएगी.. ’

माँ की बातें भव्या के लिए असह्य हो गईं थीं. आँखें भर आयी थीं.. वह क्या कहे, क्या करे, कुछ समझ नहीं पा रही थी. बस अपने बाउजी की राह देखने के सिवा वह कुछ कर भी नहीं सकती थी. बाबूजी अपनी यात्रा अधूरी छोड़ कर आ गए थे. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ था. माँ की अंतिम इच्छा पूरी नहीं हो सकी थी.

बाबूजी माँ के पास थे पर माँ की आँखें हमेशा हमेशा के लिए बंद हो चुकी थीं. वह बाउजी का आखिरी दर्शन भी नहीं कर पायी थी. अपने पति की आखिरी झलक पाने की आस लिए वह अनंत यात्रा के लिए निकल चुकी थी. खैर, बाउजी माँ के अंतिम संस्कार के लिए आ चुके थे.

बनारस में ही दाह संस्कार करके सभी घर लौट आये थे. कुछ दिनों तक पूरा घर संवेदना प्रगट करने आये दोस्तों व रिश्तेदारों से भरा रहा था लेकिन पर इतने सारे लोगों के बीच भव्या बिलकुल अकेली हो गई थी. उसने ख़ामोशी की ऐसी चादर ओढ़ ली थी कि किसी से चाह कर भी कोई बात नहीं कर पाती थी.

इसी बीच श्राद्धकर्म का दिन भी आ गया. सभी उसकी तैयारी में लग गए थे. पर अब भव्या के लिए उन कर्मों का कोई मतलब नहीं रह गया था.  
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उस दिन पूरे आंगन में ‘ना हन्यते हन्यमाने शरीरे...’ के स्वर गूँज रहे थे. भव्या के कानों से गीता के पुण्य-श्लोक लगातार टकरा रहे थे और आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी. तभी पुरोहित ने वैदिक मंत्र का पाठ करना शुरू किया था. मंत्रोच्चार से भंग हुई थी भव्या की तन्द्रा. उसका ध्यान गालों तक बह आये आंसुओं पर गया था. दुःख मिश्रित आश्चर्य से भर उठी थी वह. उसे पता ही नहीं चला था कि कब उसकी आँखें रो पड़ी थीं. मन की दशा भी बड़ी विचित्र होती है. कभी-कभी मन को शरीर की क्रियाओं का ध्यान ही नहीं रहता. खैर, उसने तत्काल अपने आंसुओं को दुपट्टे से पोछ लिया था जैसे माँ की आत्मा की शांति के लिए उसका रोना एकदम से मना हो. कहीं ना कहीं उसे लग रहा था कि तस्वीर से झांकती माँ को उसके आंसुओं से तकलीफ होगी. क्योंकि एक माँ के लिए अपनी बेटी को आंसू बहाते देखना निश्चय ही असह्य होगा. भले ही वह संसार के नश्वरता से मुक्त हो गयी हो. पर सूक्ष्म रूप से भव्या उसे अपने आस-पास महसूस कर रही थी.

भव्या अपना दुःख छुपाने की कोशिश में आँगन में चल रहे एकादशाह के श्राद्ध को देखने लगी थी. आसन लगाये पंडित जी बड़े मनोयोग से श्राद्ध की रस्में पूरी करवा रहे थे.

माँ की आत्मा की शांति के लिए जो भी हो रहा था, पूरे विधि-विधान से हो रहा था. उसी समय शय्या-दान के लिए कुछ लोग एक सुन्दर सी पलंग ले कर आये थे जिसे भव्या के बाबूजी के हाथों स्पर्श करा के दान स्वरुप एक तरफ रख दिया गया था. भव्या की निर्विकार आँखें थोड़ी सजग हो गयीं थी जैसे कुछ प्रश्न हों उन आँखों में, पर कह कुछ नहीं पाई थी. पंडित जी ने उसके बाबूजी को समझाने के भाव से कह रहे थे ..

‘सच्चिदानंद जी, ये दान उस पवित्र आत्मा की शांति और सम्मान में की जाती है, जो इस भौतिक शरीर के बंधन से मुक्त हो गयी है. ये सही है कि ये दान-कर्म है, पर इनपर पूर्ण रूप से उनका ही अधिकार होता है.’

 ‘जी पंडित जी ’ सच्चिदानंद ने बड़े निर्विकार भाव से स्वीकृति में सर हिलाया था.

सच्चिदानंद के चेहरे पर स्थाई भाव से नज़र टिकाए हुए, पंडित जी बोलते जा रहे थे..
‘क्योंकि अगर उनका भौतिक शरीर जीवित होता तो इन वस्तुओं का उपभोग करता. इसलिए आप जिन वस्तुओं को अपनी पत्नी के सम्मान में दान देना चाहते हैं, दे सकते हैं..’

कहते हुए पंडित जी ने हाथ से उस तरफ इशारा किया जिस तरफ साजो-समान रखा था.

भव्या ने गहरी सांस लेते हुए दान के लिए लाए गए साजोसामान को बड़े ध्यान से देखने लगी थी. सच्चिदानंद वहां मौजूद अन्य रिश्तेदारों को इशारे से दान की वस्तुओं को आगे बढ़ाने के लिए कहा था. कुछ रिश्तेदार आगे बढ़कर रोल किये हुए गद्दे और तकिये को सच्चिदानंद के हाथ से छुआते हुए पंडित जी के इशारे पर दूसरी तरफ रख दिया था.

भव्या को याद आया, उसकी माँ आजीवन कथरी पर सोती रही थी. एक बार उसने अपनी माँ से पूछा भी था –‘अम्मा तुम ऐसे नीचे कथरी पर क्यों सो जाती हो ?’
‘तो क्या हुआ, उधर पलंग पर तुम्हारे बाउजी की नींद खुल जाती है...मेरा क्या है सुबह जल्दी जागना होता है. चार-पांच घंटे नींद में कैसे कट जाते हैं पता भी नहीं चलता...’

हँसते हुए अम्मा ने जवाब दिया था.

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मां का जीवन किसी चलचित्र की भांति भव्या के मष्तिष्क में चलने लगा था. तमाम रस्मों-रिवाजों ने जैसे उसे मूक दर्शक बना दिया था. उसके मन में कई-कई सवाल उठने लगे थे कि क्या सचमुच माँ ने अपना जीवन पूरे अधिकार और अपनी इच्छा से जिया था ? जिन भौतिक सौगातों की भेंट माँ की आत्मा को दी जा रही है, क्या अपने जीवन काल में उसने कभी उसका उपभोग किया था और किया था तो कितना ?? ऐसे जाने कितने कितने सवाल भव्या को झकझोर रहे थे.  

भव्या की नज़र अपने बाउजी पर ठहर गई थी, एक रिश्तेदार ने कुछ साड़ियाँ और शॉल उसके पिता की ओर बढ़ाया था और वो उसे माँ की आत्मा को भेंट कर रहे थे. भव्या के मन में माँ की तस्वीर कौंध जाती है.... हड्डियों को कंपा देने वाली ठण्ड में माँ एक पुराना साल ओढ़े हुए थी जो एक जगह फट गया था. एक बार उस फटे शॉल की मरम्मत करते देख कर भव्या ने माँ से कहा था, ‘अम्मा इसे सिलने से अच्छा है कि बाउजी से नया ही मंगवा लो, ये बहुत पुराना भी हो गया है. इससे ठण्ड भी नहीं जाती होगी. ’

‘अरे ऐसा भी पुराना नहीं हो गया है, ये सिल जाएगा तो काम लायक हो जाएगा. क्या बात-बात में तेरे बाउजी को परेशान करना...तू जा अपना काम कर. बेकार की बातों में अपना माथा न खपाया कर.’

और भव्या खीज कर वहां से चली गयी थी.
भव्या औरतों के लिए पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था, त्याग और कर्त्तव्य को अपने आस-पास देखती आयी थी, उन सब के प्रति उसके मन में कितने ही सवाल उठने लगे थे और अनचाहे ही उसका मन विद्रोह की पृष्ठभूमि रचने लगा था.   

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महादान का टंट-घंट देखते हुए भव्या को बेचैनी सी होने लगी थी. वह वहां से भाग जाना चाहती थी पर उसका शरीर जड़ हो गया था. अपने हाथों से एक जोड़ी चप्पल दान करते अपने पिता को देख कर उसके चेहरे पर एक विकृत सी हंसी उभर आई थी. उसी विकृत मुस्कान के साथ उसकी नज़र एक बार फिर से अपनी माँ की तस्वीर पर जा कर ठहरी थी. एक बार फिर से यादों के भंवर डूबती वह अतीत में पहुँच गई थी ....

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बरामदे में किताब के पन्ने पलट रही भव्या का ध्यान अचानक अपनी माँ पर गया था जो आँगन में झाड़ू लगाते-लगाते उफ़ करके बैठ गयी थी. शायद उसकी मां के पैरों में कुछ चुभा था, जिसे वह निकलने की कोशिश कर रही थी. भव्या किताब एक ओर रख कर दौड़ती हुई उसके पास पहुँची थी और माँ के पैर से कांटा निकालते हुए कहा था –
‘चप्पल क्यों नहीं पहना अम्मा..कहाँ है तुम्हारी चप्पल ?’
‘होगा कहीं..काम की जल्दी में ध्यान ही नहीं रहा. कुछ नहीं हुआ तू जा अपनी पढ़ाई कर..’ माँ ने लापरवाही से जवाब देते हुए वो उठ कर जाने लगी थी तो भव्या उसे रोकते हुए कहा था.. 
‘तुम रुको, हम अभी ले कर आते हैं.’
और वो चप्पल लेने चली गयी थी. बरामदे में एक ओर रखी एक जोड़ी हवाई चप्पल उठा कर उसे लेकर आगे बढ़ने को थी कि उसका ध्यान चप्पल के टूटे हुए फीते पर गया था. खीज कर उसने चप्पल को वहीँ पटक दिया था और मां को अपने पैरों की चप्पल पहनाई थी...
‘ये लो, इसे पहन लो अम्मा, अपना ध्यान खुद नहीं रखोगी तो दूसरा कौन रखेगा? तुम सिर्फ दूसरो के लिए मरती रहती हो, अपनी जरूरतें तो तुम्हें समझ में ही नहीं आतीं..’ अम्मा पर उसकी बातों का कोई ख़ास असर नहीं हुआ था. उसने हँसते हुए कहा था..
‘बस कर मेरी अम्मा, एक चप्पल के लिए इतना भाषण मत दे.. मंगा लेंगे तेरे बाउजी से.. अब तू कहे तो जाऊँ...’ दोनों हंस पड़ी थीं.
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भव्या बेचैनी में उठ कर खड़ी हो गयी थी. उसके चेहरे का रंग बदलने लगा था. मन्त्रों का स्वर असह्य लगने लगा था, उसे सब कुछ झूठा-दिखावा और आडम्बर सा लगने लगा था. दान के लिए रखे सोने के चमचमाते गहनों, गले का चैन, कान के फूल और सोने की चूड़ियों को देखना उसके लिए किसी कठोर मानसिक यंत्रणा से कम नहीं थी. स्वर्ण-दान का सिलसिला शुरू हुआ था भव्या तिलमिला गई थी. गुस्से और बेचैनी में उसने अपना मुंह दूसरी ओर फेर लिया था. उसकी माँ ने अपने जीवन काल में जो गहने पहने थे वो उसकी आँखों के सामने कौंध गए थे..
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गहनों के नाम पर उसने माँ के गले में लाल धागे में पिरोया एक छोटा सा जियुतिया पहने ही अक्सर देखा था और हाथ में कुछ लाल चूड़ियां. एक बार भव्या ने टोका भी था पर माँ ने हंस कर टाल दिया था.. ‘तुम्हारी दादी ने सब संभल के रखा हुआ है, कोई ख़ास मौका होगा तो पहन लेंगे और वैसे भी तेरे बाउजी के होते हमको किसी और गहने की क्या जरुरत है?’
भव्या सोच में पड़ जाती कि ना जाने औरतों को जीने के लिए, किसने ऐसे फलसफे गढ़े होंगे ... क्यों ऐसी परम्पराओं को एक औरत से दूसरी तक पहुँचाने के लिए एक औरत को ही मोहरा बनाया जाता रहा ? शायद उनकी प्रकृति ही उनके पैरों की बेड़ियाँ बन गयी होंगी तभी तो ऐसी परम्पराओं के कुछ संस्कार एक माँ से बेटी को और कुछ संस्कार एक सास से बहू को दिलवाए गए. लेकिन इन सवालों को वह पूछे तो किससे पूछे, अम्मा से पूछती तो झिड़क देती. दादी से पूछती तो बदतमीज कहलाती और अगर समाज से पूछने जाती तो असभ्य और संस्कारहीन कही जाती.
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सहनशीलता की भी एक सीमा होती है. आत्मा की शान्ति के नाम पर चल रहे इस क्रिया कर्म ने आखिरकार भव्या की सहनशीलता को उस छोर पर ला कर खड़ा कर दिया था जहाँ संयम और विवेक ने उसका साथ छोड़ना शुरू कर दिया और वो श्राद्धकर्म के अन्तिम दौर तक पहुँचते-पहुँचते  अजीब सी हरकतें करने लगी. उसने अचानक हंसना शुरू कर दिया और लगातार हंसती ही गयी .... घर वालों का लगने लगा वह पागल हो गई. सच्चिदानंद तो बहुत परेशान हो गए थे. आँगन में मौजूद तमाम लोगों में काना-फूसी शुरू हो गई थी, कोई कहता....
‘माँ के मरने का सदमा लगा है ...’ तो कोई कहता...
‘माँ की आत्मा का साया पड़ गया है..’
‘ये तो बड़ा अशुभ है..ऐसे समय पर इस तरह हँसना..पता नहीं अब इस घर में क्या होनेवाला है..’ सब अपनी मानसिक पहुँच के हिसाब से अपने विचार व्यक्त करने लगे थे. उसकी विक्षिप्त हंसी देख कर पंडित जी सहित सभी अपनी जगह से उठ गए थे. घर के लोग, उसकी दादी और रिश्तेदारों ने उसे सांत्वना देने और समझाने के लिए जब उसके पास पहुंचे थे तो वह एकदम से आक्रामक हो कर आस-पास की चीज़ों को जहाँ-तहां फेंकने लगी थी, जैसे सारी व्यवस्था बदल कर मानेगी. उसकी सोचनीय अवस्था देख कर सच्चिदानंद आगे बढ़े थे और उसके कंधे पर हाथ रख कर उसे रोकने की कोशिश की थी..
‘भव्या, भव्या...ये क्या पागलपन है बेटा, हम हैं ना.......  होनी को कौन टाल सकता है....., शांत हो जाओ, सब ठीक हो जायेगा...’
पर वो जैसे कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी. उसने नफरत से अपने पिता को धकेल कर अपने से दूर कर दिया था. वह गिरते-गिरते बचे थे. सभी अपनी जगहों पर जड़ से हो गए थे. भव्या  के पिता हतप्रभ हो कर दो कदम पीछे हो गए थे. उन्हें समझ कुछ समझ में नहीं आ रहा था. वह कुछ कहते उससे पहले भव्या चीख पड़ी थी...
बंद कीजिये ये हक़ और अधिकार का पाखंड ! ये आत्मा के सम्मान और शांति का पाखंड ! ये कैसा हक है जो मरने के बाद ही दिया जाता है ? क्या जिंदा लोगों का कोई हक़ और सम्मान नहीं होता ? अगर ये उसका हक था तो उसे जीते जी क्यों नहीं दिया गया ? जिसका शरीर जीते जी अतृप्त रहा हो...मरने पर उसकी आत्मा कभी नहीं तृप्त हो सकती है......कभी नहीं....’ !!
इतना कह कर रोती हुई भव्या अन्दर कमरे में भाग गयी थी ...पूरे माहौल में सन्नाटा छा गया था ... सच्चिदानंद और पंडित जी के साथ-साथ वहां मौजूद तमाम लोग किंकर्तव्यविमूढ़ खड़े रह गए थे......!!


                                              सुमन उपाध्याय  

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