Thursday, 3 November 2016

कविता - तर्पण





जंगल से कंदराओं तक
झोपड़ी से अट्टालिकाओं तक
सर्वत्र व्याप्त एक पुकार !
आदिम से आधुनिक की पुकार,
मनुष्यता से पशुता तक की पुकार,
कभी स्वर याचना का, कभी अनुराग का,
मुश्किल नहीं है स्वर के इंद्रजाल को समझना,
फिर भी जारी है लगातार
देह हेतु देह की पुकार !
सदियों से, सम्पूर्ण आवेग में,
अपनी सुन्दरतम भावनाओं सहित
अप्रतिम संयम की साक्षी - स्त्री देह !

आवश्यकता स्त्री-देह की, जन्म हेतु
आवश्यकता स्त्री-देह की, प्रेम हेतु
आवश्यकता स्त्री-देह की, मोक्ष हेतु
कायम रहती है स्त्री-देह की आवश्यकता, मृत्यु पश्चात् भी
तर्पण की आकांशा हेतु !

परंपरा जीवन की, जीवन के विकास की,
परंपरा सभ्यता-संस्कृति बनाये रखने की,
तमाम आवश्यकताओं में परम आवश्यक - स्त्री-मन !
रौशनी ढूँढती जुगनुओं में, गुनती मन ही मन अहर्निश उपेक्षित अस्तमना,
क्यों शेष रह गई है आवश्यकता सिर्फ देह की ..?
सिर्फ एक स्पन्दनहीन और मृत देह की आवश्यकता !!

                      सुमन उपाध्याय 

1 comment:

  1. Very apt question you have raised and its time the spciety ponders over it.

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