वो कहते हैं, हम नहीं मानते मानते मंदिर और भगवान्
क्या उन्होंने बनाया है ?
ये तो हम इंसानों के बनाये हुए धंधे हैंहमारे मन के अन्दर हैं वो |
सही तो कहा मेरे अजीज तुमने
वो जो कहीं दिखाई नहीं देता
हर उस जगह है, जहाँ वो दिखाई नहीं देता |
उसने तो नन्हें-नन्हें निरावृत निर्दोष तन-मन भेजा सिर्फ
हम इंसानों ने ही तो उसे व्यसनों से अलंकृत किया है
हमारी आवश्यकताएं व्यसन हो गयीं हैं
वस्त्रों का व्यसन हुआ तो
भिक्षुक की लंगोटी माडलों का सेंस ऑफ़ फैशन हो गया |
प्रकृति से बचने की जरुरत व्यसन बनी जब
सोख बैठी धरा की हरियाली और नमी
स्मृतियों में फैली हरियाली घरों के अन्दर गमलों में मिली
मन रहा सूखा, नज़रों की प्यास मिटने लगी कृत्रिम झरनों से |
हमने ही बनाया है उन कागज़ के उन टुकड़ों को ख़ास
वर्ना वो तो निरे मान्यताएं हैं, सिर्फ मान्यताएं !
मान्यताएं बदली नहीं कि पुनः बेजरूरती हो गए
मान्यताएं तो बदलती रही हैं, बदलती रहेंगी,
आवश्यकताएं जरुरत से बाहर व्यसन हैं
हमने स्वयं को स्वयं ही व्यसनी बनाया है
तो क्यों कोसना, पंक्तिबद्ध खड़े रहें मौन |

जैसे जैसे विज्ञान प्रगति पर है हम ईश्वर के प्रति नरम हो रहें हैं
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