Friday, 9 December 2016

डायरी का एक पन्ना...२



5/12/16
या रब कभी तो इतनी हिम्मत बख्शना
कि मिट जाने से पहले मैं, मैं हो जाऊं !
आज से तीन साल पहले लिखी इन पंक्तियों की को फेसबुक पर पोस्ट किया था. आज फेसबुक ने याद दिला दिया. और अपनी ही लिखी पंक्तियों पर कुछ कहने को मन हो आया. अगर हुआ तो कहूँ कहाँ, तो बस लिख ही देती हूँ. तब जाने किस मानसिक अवस्था में लिखी हूँगी. पर आज जब इन लइनों को एक तटस्थ द्रष्टा की तरह देखती हूँ तो एक अलग ही ताना बाना बुना हुआ दिखाई देता है. चूंकि ये मेरे द्वारा ही लिखा गया है, इसलिए अगर आप इसे मेरी निजता से जोड़ेंगे तो भी कोई बात नहीं.
लेकिन अगर इसे स्व से सर्व की मोड़ कर देखेंगे तो समझ आयेगा यह महज दो पंक्तियाँ नहीं हैं. यह एक यात्रा है. एक कहानी है. कहानी के अन्दर छिपे हुए अंतर्द्वंद है. इसके अन्दर एक छटपटाहट और आकुलता का शिथिल संगीत है जो बरबस अपनी जकड़न से बाहर निकलना चाहता है. उन बेड़ियों को तोड़ना चाहता है जो दिखाई तो नहीं देतीं, लेकिन बड़ी ही मजबूती से अपनी अस्तित्व को कायम रखा है.
जब हम केवल द्रष्टा हैं और उस परिस्थिति विशेष में घुल-मिले नहीं होते हैं, कथन या लेखन में सहजता बनी रहती है. संभवतः सर्वग्राह्यता भी. लब्बो लुआब ये है की मन के दरवाज़े खिड़की खोल कर समझने की जरुरत है ना कि किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर पढने सुनने की.

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