Friday, 25 November 2016

मैं और तुम |




१.
मैं चाँदनी
तुम रात हो
मैं क्या तुम बिन !
तुम क्या मुझ बिन !
न दिखाओ !
न दिखाओ ताब जुगनुओं का हमें,
वैसे हमारे आँचल में भी
अनगिनत सितारे जड़े हैं !


2.

मैं खिली और बिखर गयी
तुम संवरे और अकड़ गए,
अब सोचूं संवार लूं खुद को भी
कविता के लय और छंदों से
और गूंजूं स्वर लहरी बन अन्तरिक्ष में,
और तुम ढूंढ़ते रहो मुझे
अपने सत्ता और स्वामित्व के बगीचे में !

Sunday, 20 November 2016

व्यसन

 वो कहते हैं, हम नहीं मानते मानते मंदिर और भगवान्
क्या उन्होंने बनाया है ?
ये तो हम इंसानों के बनाये हुए धंधे हैं
हमारे मन के अन्दर हैं वो |

सही तो कहा मेरे अजीज तुमने
वो जो कहीं दिखाई नहीं देता
हर उस जगह है, जहाँ वो दिखाई नहीं देता |

उसने तो नन्हें-नन्हें निरावृत निर्दोष तन-मन भेजा सिर्फ
हम इंसानों ने ही तो उसे व्यसनों से अलंकृत किया है

हमारी आवश्यकताएं व्यसन हो गयीं हैं
वस्त्रों का व्यसन हुआ तो
भिक्षुक की लंगोटी माडलों का सेंस ऑफ़ फैशन हो गया |

प्रकृति से बचने की जरुरत व्यसन बनी जब
सोख बैठी धरा की हरियाली और नमी
स्मृतियों में फैली हरियाली घरों के अन्दर गमलों में मिली
मन रहा सूखा, नज़रों की प्यास मिटने लगी कृत्रिम झरनों से |

हमने ही बनाया है उन कागज़ के उन टुकड़ों को ख़ास
वर्ना वो तो निरे मान्यताएं हैं, सिर्फ मान्यताएं !
मान्यताएं बदली नहीं कि पुनः बेजरूरती हो गए
मान्यताएं तो बदलती रही हैं, बदलती रहेंगी,

आवश्यकताएं जरुरत से बाहर व्यसन हैं
हमने स्वयं को स्वयं ही व्यसनी बनाया है
तो क्यों कोसना, पंक्तिबद्ध खड़े रहें मौन |




Saturday, 5 November 2016

डायरी का एक पन्ना....



१३/१०/१६
                      

दिन का सपना

आज दोपहर घर में अकेली थी. मंटो पर लिखे एक लेख पढ़ रही थी... आँखें बोझिल सी होने लगीं. आधे घंटे के लिए आँख लग गयी.
देखा मेरे फिश टैंक की सबसे बड़ी मछली अपने टैंक की छत में बने सूराख से झांक रही है. मैं ये सोच ही रही थी कि ये क्या कर रही है..उसने वहां से छलांग लगा दी. मैंने देखा उसे छलांग लगाते. लेकिन मुझे जरा भी घबराहट नहीं हुयी.. मैं जनती थी ये बड़ी जीवट वाली है- मरेगी नहीं | मैं भी उसे वहां ऐसे ही छोड़ एक हल्के हरे रंग के प्लास्टिक के मग में पानी लेकर आई. उसे वहां से उठा कर उसकी मुंह की तरफ से पानी में डूबोया कि जल्दी से सांस ले सके. गुड़गुड़ सी हुयी. लगा उसे रहत मिली. मैंने कहा – ये क्या सूझी तुझे ? अच्छी-भली इतने बड़े टैंक में मजे कर रही थी..क्यूँ कूदी ? वो कुछ नहीं बोली, बस फिर से मग के सिरे से झाँकने लगी. इससे पहले मैं कुछ समझ पाती वो फिर से कूद गयी. मैंने लपक के उसे उठाया, और डाँटते हुए फिर से उसे मग वाले पानी में डाल दिया. मैंने देखा मछली के साइज़ के हिसाब से मग और उसका पानी काफी नहीं था. लेकिन कूदी तो वो उस बड़े टैंक में से भी थी.
‘क्यूँ मरना चाहती है ?’
मछली हंसी. फिर से कूदी और तभी मैंने देखा वो हवा में तैरने लगी, बिलकुल वैसे ही जैसे पानी में तैर रही थी. जैसे उसके लिए हवा और पानी का भेद मिट गया हो.
हाय !!
‘ये कैसे किया तूने ?’
वो खिलखिला पड़ी.
लेकिन अन्दर के डर ने जोर मारा और फिर से मैंने उसे पकड़ के उसी मग वाले पानी में डाल दी. अब तो ये खेला हो गया हम दोनों का. वो बार-बार हंस कर भाग जाती और मैं उसे पकड़ के उसी मग में डालती.  
तभी उसकी खिलखिलाहट रुक गयी, मैंने एक बढ़ा हुआ हाथ देखा जिसने एक काली मछली, सूई जैसी मुंह वाली, उस मग वाले पानी में डाल दिया.
बस, मेरी नींद खुल गयी |

Thursday, 3 November 2016

कविता - तर्पण





जंगल से कंदराओं तक
झोपड़ी से अट्टालिकाओं तक
सर्वत्र व्याप्त एक पुकार !
आदिम से आधुनिक की पुकार,
मनुष्यता से पशुता तक की पुकार,
कभी स्वर याचना का, कभी अनुराग का,
मुश्किल नहीं है स्वर के इंद्रजाल को समझना,
फिर भी जारी है लगातार
देह हेतु देह की पुकार !
सदियों से, सम्पूर्ण आवेग में,
अपनी सुन्दरतम भावनाओं सहित
अप्रतिम संयम की साक्षी - स्त्री देह !

आवश्यकता स्त्री-देह की, जन्म हेतु
आवश्यकता स्त्री-देह की, प्रेम हेतु
आवश्यकता स्त्री-देह की, मोक्ष हेतु
कायम रहती है स्त्री-देह की आवश्यकता, मृत्यु पश्चात् भी
तर्पण की आकांशा हेतु !

परंपरा जीवन की, जीवन के विकास की,
परंपरा सभ्यता-संस्कृति बनाये रखने की,
तमाम आवश्यकताओं में परम आवश्यक - स्त्री-मन !
रौशनी ढूँढती जुगनुओं में, गुनती मन ही मन अहर्निश उपेक्षित अस्तमना,
क्यों शेष रह गई है आवश्यकता सिर्फ देह की ..?
सिर्फ एक स्पन्दनहीन और मृत देह की आवश्यकता !!

                      सुमन उपाध्याय