१.
मैं चाँदनी
तुम रात हो
मैं क्या तुम बिन !
तुम क्या मुझ बिन !
न दिखाओ !
न दिखाओ ताब जुगनुओं का हमें,
वैसे हमारे आँचल में भी
अनगिनत सितारे जड़े हैं !
तुम रात हो
मैं क्या तुम बिन !
तुम क्या मुझ बिन !
न दिखाओ !
न दिखाओ ताब जुगनुओं का हमें,
वैसे हमारे आँचल में भी
अनगिनत सितारे जड़े हैं !
2.
मैं खिली और
बिखर गयी
तुम संवरे और अकड़ गए,
अब सोचूं संवार लूं खुद को भी
कविता के लय और छंदों से
और गूंजूं स्वर लहरी बन अन्तरिक्ष में,
और तुम ढूंढ़ते रहो मुझे
अपने सत्ता और स्वामित्व के बगीचे में !
तुम संवरे और अकड़ गए,
अब सोचूं संवार लूं खुद को भी
कविता के लय और छंदों से
और गूंजूं स्वर लहरी बन अन्तरिक्ष में,
और तुम ढूंढ़ते रहो मुझे
अपने सत्ता और स्वामित्व के बगीचे में !


