मुंबई
लौटते ही हमारे बेहद ऊर्जावान एवं युवा मित्र की सद्यःप्रकाशित किताब ‘लेखकों की
दुनिया’ खुले लिफाफे के अन्दर बाहर आने के लिए कुलबुलाती हुई मिली. इसके कवर को
इतनी बार इसके अन्दर के गद्यांशों के साथ, इसके लेखक के पोस्टों के माध्यम से,
देख-पढ़ चुकी हूँ कि यह किताब बिलकुल भी नई नहीं लगी. लगा इसे कब से थोड़ा-थोड़ा पढ़ती
आ रही हूँ.
सबसे
पहले इस हस्ताक्षरित प्रति को भेजने के लिए Suraj Prakash जी को सादर धन्यवाद !!!
अब आते
हैं किताब पर... किताब अपने आप में ह्यूमर और रोचकता का समन्दर है. इसे कहीं से भी
पढ़ना शुरू किया जाय उतनी ही प्रवाहमय लगेगी. ऐसी कितनी ही जानकारी जिसे जानने के
लिए हमें अपने चश्मों के नंबर बढ़ाने पड़ सकते थे, कुछ पन्नों में समेट हमारी
ऊँगलियों के पोरों तक ला छोड़ा. हमारी सुंदर आँखों की तरफ से पुनः आभार !!! JJ
अभी कुछ
पेज ही पढ़ पाई हूँ. इतना ही पढ़ते-पढ़ते सोचा अपनी कोमल भावनाओं को आप सब तक प्रेषित
करती चलूँ. हम सच्ची कहते हैं आज ट्रूमैन कपोते होते तो हम उनकी कोई कहनी या
उपन्यास नहीं पढ़ते, भई भला ये क्या बात हुई, जनाब अपने वहम के चक्कर में हम 3-13
नंबर वालों का अस्तित्व ही नकारे जाते हैं. लेकिन अब पढ़ेंगे, जरुरी हो गया है
उन्हें समझने के लिए.
पाठक कई
बार लिखे हुए को खुद से जोड़कर देखने-सोचने लगता है. आचार्य शुक्ल ने रचना में लोक
का होना अनिवार्य तत्व माना है. ऐसे में किसी रचना को हम यदि खुद से जुड़ा हुआ पाते
हैं या किसी पात्र के स्थान के पर स्वयं को रखकर देखने लगते हैं तो वही उस रचना की
उपलब्धि मानी जाती है. आचार्य शुक्ल ने जिस व्यक्ति-वैचित्र्यवाद की चर्चा की रचना
के साधारणीकरण के सम्बन्ध में की है, उन सभी अनुभूतियों का दर्शन सहज ही इसमें हो
जाता है.
अब
देखिये, कवि दिविक रमेश और डी. एच. लॉरेंस की कल्पना शक्ति को तूत के पेड़ पर चढ़ने
के बाद पंख लग जाते थे. लेकिन हम सोचते हैं अगर हम उनकी जगह शहतूत की डालियों पर
चढ़े होते तो हमारा तो सारा फोकस डालियों पर लगी लाल-काली खट्टी-मिट्ठी शहतूतों पर
ही होता. हमारा तो सारा सोच-सोचाया ख्याल या आईडिया हवा हो जाता. संक्षेप में....
कमाल
हैं लेखक और कमाल लेखकों की दुनिया !!!
चलते-चलते
यह भी बता ही देती हूँ.... यह किताब तो निस्संदेह रोचक है किन्तु इस किताब का मुझ
तक पहुंचना भी कम रोचक नहीं.
जय राम
जी की !
