बांधो,
तुम बांध बांधो,
बुद्धि की तीक्ष्णता पर,
मन की खुली चाहतों पर,
आंखों में पलते सपनों पर,
स्वयं पर स्वयं के अधिकार पर,
और
बहने दो सिर्फ कलकल कोमलता।
सौम्य सेवाभाव की सर्वसुलभता।
पर हां,
आवेगों को मरने न देना।
यह जीवन नहीं, प्रवंचना मात्र है।
कान दो !
स्मरण रखना; आवेगों का दबाव बढ़ेगा
और बढ़ेगा
और बढ़ेगा,
टूटेंगे एक-एक कर सारे बांध
जलजला आएगा
तुम उत्सव मनाना,
तुम्हारा व्यक्तित्व
रचेगा अप्रच्छन्न अस्तित्व
तुम मंत्र पढ़ना
चाक चलाना और
छेनी-हथौड़ी के संगीत पर नर्तन करना
फिर,
पसीने से लथपथ
एकांत में,
पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी पर बांसुरी बजाना।
यह तो बहकी-बहकी बातें है।
क्यों, नहीं बहकना तुम्हें ?
यह तो आत्म-प्रवंचना है।
नहीं, यह जीवन है।